स्वर्ग का अधिपति; ‘हुलेश्वरानंद पापोनाश्क महाराज’ की कथा

नारायणपुर से संतोष नाग की रिपोर्ट
नारायणपुर से संतोष नाग की रिपोर्ट

सुबह मैं टहलते हुए घर लौट रहा था, मगर शायद होली की इतनी चढ़ गई थी कि मैं सुनसान और अनजान रास्ते में भटक गया था। शायद भूलन खुंद लिया था। घंटो चलता रहा तब जाकर एक जगह मुझे सूर्य के सुनहरे धूप से रौशन घर दिखाई दिया। मैं इससे पहले नारायणपुर में ऐसा घर कहीं नहीं देखा था, विश्वास था अबूझमाड़ सहित समूचे बस्तर में ऐसा घर कहीं नहीं है। फिर भी विश्वास का मुझे कौन सा मुरब्बा बनाना है, मुझे तो मुरियापारा वापस लौटने का रास्ता जानना था सो मैं घर के निकट जाने का निर्णय लिया।

घर के किनारे से जाती हुई बेहद पवित्र जल वाली एक नरवा गुजर रही है। मैंने मारे थकान और प्यास के चुल्लू भर पानी पीने का निर्णय लिया, किनारे उतरकर पानी को स्पर्श किया, बिल्कुल कंछ शीतल जल। हाथ धोकर चुल्लू भर पानी पीया, आहा! अति उत्तम! ऐसा स्वादिष्ट पानी मानो नारियल पानी हो। पीते हुए गले तक भर लिया तब समझ में आया कि बहुत पी लिया हूं। अब नहीं पीना घर जाने का रास्ता खोजना है। आज पहली बार ऐसा हुआ है कि मैं घर में मोबाइल फोन भूलकर आया हूं अन्यथा दुर्गम्या और तत्वम जोशी के कहां हो पापा? कब आओगे पापा? इतनी देर से क्या कर रहे हैं पापा? का जवाब नहीं दे सकता।

पानी पीकर आगे बढ़ा, नरवा के पार से लगा हुआ ये सैकड़ों एकड़ के प्लाट में रंग बिरंगे अनोखे फूलों की बगिया। सबमें एक विशेष प्रकार की सुगंध। मानो परमानंद की प्राप्ति हो गई। वो वाला परमानंद नहीं, हां परमानंद घिरी नहीं जो मेरे बचपन के मित्र हैं। हालांकि परमानंद घिरी प्राथमिक स्कूल, मनकी में ऐसे मित्र रहे हैं जो बहुत आनंददायक थे। अपने नाम की भांति बेहतरीन इंसान। परमानंद की अनुभूति से बाहर निकलने का प्रयास भी नहीं कर पाया था कि फूलों की बगिया में फूलों से खेलते हुए, तोड़ मरोड़ करते हुए, फूलों को चुनते चुनते कब सुबह भाई साहब दोपहर और शाम से गुजरते हुए रात में तब्दील हो गई पता ही नहीं चला। चंद्रमा की शीतल रोशनी और कनकमई फूलों की चमक के वजह से रात होने का भी आभाष नहीं हो रही थी। मैं कौन हूं? कहां हूं? ये क्या कर रहा हूं? सबकुछ भूल गया था, बिल्कुल बच्चा हो गया था। बुद्धू बालक। अंतहीन आनंद में सराबोर चंचल बालक। बच्चों को खेल से अलग केवल भूख और प्यास ही कर सकता है, ठीक मुझे भी भूख लगी। चेतना जगी। चूंकि “चेतना बचपन का दुश्मन..!” मैं पुनः बचपन और परमानंद से बाहर भूख के आगोस में। वो सामने स्थित घर अब तक सुनहरी नहीं बल्कि दूधिया रोशनी में बेहद खूबसूरत लग रही है। अब मैं पूर्ण चेतना में हूं किंतु मेरा ध्यान मात्र भोजन और भूख पर केंद्रित है।

भूख से तड़पता हुआ अब मैं उस घर के आंगन में हूं। बेहतरीन नक्कासियों से बनी दुर्लभ प्रकार का दरवाजा। बहुत हाईटेक शायद ऐसा हाई टेक्नोलॉजी की खोज करने भी हमें लाखों हजार साल लगेंगे।

“भीतर कोई हैं..?” मैंने आवाज दी। भीतर से ‘हुलेश्वरानंद पापोनाश्क महाराज’ की जय के नारे सुनाई देने लगी। मैं थोड़ा डर किंतु गौरव के साथ गृह प्रवेश किया। दुर्लभ और सुगंधित फूलों की बरसात के साथ मेरा स्वागत हुआ। एक दिव्य पुरुष रुसे फुल के मालों का हार लेकर मेरे समीप आया। मान्यवर प्रणाम… स्वर्ग की इस अद्भुत महल में आपका हार्दिक अभिनंदन और स्वागत है।

मान्यवर ‘हुलेश्वरानंद पापोनाश्क महाराज’ आप अपने पुण्यप्रताप और कर्मों के फल से स्वर्ग के अधिपति हैं। इसके बावजूद आपने मोक्ष की स्वीकृति देने में बड़ी देर लगा दी। कई लाखों सालों से मुझे मोक्ष से मुक्त होकर पृथ्वी लोक में इंसान बनने की चेष्ठा रही है किंतु आपके आगमन में विलम्ब के कारण मुझे मोक्ष से मुक्ति और इंसान के रूप में जन्म लेने के लाभ से वंचित रहना पड़ा है। सो आप आज से स्वर्ग के अधिपति के जिम्मेदारी का निर्वहन करिए कहते हुए उस दिव्य पुरुष ने एक अप्सरा से मेरा परिचय कराते हुए ये “देवी प्रिया” हैं इन्हें बहुत जन्मों पूर्व आपसे प्रेम हुआ था। ईश्वर की खूब भक्ति की है और कई जन्मों तक इन्होंने बड़ा परोपकार किया है। किंतु आप विधि के पति हैं, देवी प्रिया आपके और विधि के प्रेम के बीच कोई दीवार नहीं बनाना चाहती हैं, इसलिए देवी प्रिया ने संकल्प लिया है कि ये समर्पित होकर आपकी हर प्रकार से सहयोग करेंगी और स्वर्ग के अधिपति के रूप में आपका मार्गदर्शन करेंगी। चूंकि आप मृत्युपूर्व मोक्ष को प्राप्त हुए हैं इसलिए जब आप मोक्ष से मुक्त होने का निर्णय लेंगे तब सबसे पहले आप देवी प्रिया को अवगत कराएंगे ताकि देवी प्रिया किसी अन्य देवी को यहां का कार्यभार सौंपकर स्वयं भी मोक्ष का त्याग करके पृथ्वी में आपके साथ आपके द्वारा इच्छित योनि में जन्म लेकर आपकी प्रेमिका हो सकेंगी। अंत में दिव्य पुरुष ने मुझे एक स्वेत पुष्प और एक स्वेत ध्वज भेंटकर मेरा चरण स्पर्श किया और वहां से प्रस्थान कर लिया।

देवी प्रिया सभी देवी देवताओं से मिलवाकर मेरा परिचय कराया। मैंने अपनी इतनी प्रशंसा कभी भी शायद किसी भी जन्म में नहीं सुनी थी। स्वर्ग की अधिपति के पद पर मेरी पहली पोस्टिंग की खुशी में एक शानदार OpenFood Party रखी गई थी। नाना प्रकार के भोजन और पकवान, शुद्ध शाकाहार, बेहद स्वादिष्ट। भर पेट खाने के बाद देवी देवताओं के साथ वार्तालाप से नजर चुराकर मैं इधर उधर झांकने लगा तो देवी प्रिया मुस्कराते हुए बोलीं ‘हुलेश्वरानंद पापोनाश्क महाराज’ यहां कोई सोमरस, मंगलरस और संडेरस जैसा कोई रस नहीं मिलता है। आपको रियल फ्रूट जूस से ही जीवन चलाना पड़ेगा, ताकि आप स्वर्ग में निरोगी जीवन जी सकें। मैं भी बेहद प्रसन्न हुआ; क्योंकि यदि स्वर्ग में मांसाहार, मदिरापान सहित भोग विलास का प्रावधान होता तो मैं मोक्ष से मुक्त होने का त्वरित निर्णय ले लेता।

मैं मांसाहार, मदिरापान और भोगविलास का कट्टर विरोधी हूं इसलिए आज स्वर्ग में भी मुझे इन सबसे नफरत है। सोच रहा था यदि ऐसा कुछ होता तो स्वर्ग का अधिपति होने के नाते इसपर कठोरतापूर्वक निर्णय लेकर एक अच्छा राजा होने का जिम्मेदारी पूरा कर लेता। किंतु यदि फिर भी किसी कारण से स्वर्ग को मांस, मदिरा और व्यभिचार से मुक्त न करा पाता तो स्वर्ग की अधिपति के पद से खुद को मुक्त करते हुए वापस पृथ्वी लौट जाता या चाहे तो नर्क ही चले जाने का निर्णय ले लेता।

पार्टी समापन के बाद देवी प्रिया मुझे महुआयुक्त विशेष पान चबाने अनुरोध की। मैं उनके आग्रह का सम्मान करते हुए उनके स्वर्ण पेटी से पान लेकर चबाने लगा; बेहद स्वादिष्ट। आनंद आ गया। मैंने देवी प्रिया को बताया कि अपने बस्तर में महुआ का लड्डू बनता है मैंने कई बार खाया है। एक बेहतरीन इम्यूनिटी बूस्टर है महुआ लड्डू।अच्छा लगता है। बस्तर में महुआ से बनी चाय बहुत प्रसिद्ध हो रही है हालांकि मैंने कभी महुआ चाय नहीं पी है। मैंने उन्हें ये भी बताया कि जब वो मोक्ष से मुक्त हों तो उन्हें बस्तर में जन्म लेना चाहिए। क्योंकि बस्तर बेहद खूबसूरत स्थान है। स्वर्ग जैसे शांति और आनंददायक जीवन के लिए बस्तर में जन्म लेना सर्वथा उचित है। ऊंचे पहाड़ पर्वत, झील और झरने से युक्त प्रकृति की गोद में ही मानव जीवन में आनंद मिलता है। शहरी जीवन की भागमभाग शांति और सुकून से कोसों दूर किंतु विलासिता और सुविधाओं से आच्छादित है।

शांति और सुकून की बात सुनकर देवी प्रिया को हमारे पिछले जन्म की बचपन याद आ गई। तब वो मुझसे बेहद प्रेम करती थी, अकथित किंतु अपार प्रेम की रोगी देवी प्रिया ने मेरी विवाह की सूचना प्राप्त करते ही आजीवन बाल ब्रम्हचर्य व्रत का पालन करने का संकल्प लेकर लगभग दो कल्प युग तक मानव जीवन में परमार्थ करते हुए मोक्ष प्राप्त किया है। देवी प्रिया से वार्तालाप करते हुए रात्रि गुजर गई और दूसरे दिन की सूरज सिर पर आने वाली थी इसके बावजूद अंतहीन बचपन की यादें जीने में हम दोनों मशगूल थे।

पापा उठो न..!
आज मेरी रिजल्ट घोषित होने वाली है।
मैं तैयार हो गई हूं।
आप कब जगेंगे.?
चलो, उठो पापा..!
कु दुर्गम्या जोशी के इन पांच अमृत प्रश्नों के साथ जब निद्रा की त्याग किया तो पता चला मैं मुरियापारा नारायणपुर में ही हूं। अपने परिवार के साथ हूं। ये कोई स्वर्ग नहीं है। मुझे कोई मोक्ष प्राप्त नहीं हुआ है। मैं किसी स्वर्ग का अधिपति नहीं हूं। चलिए अब स्नान करने जाता हूं। शुक्र है आज परीयना प्रशिक्षण (सेना, सशस्त्र बल और पुलिस भर्ती के लिए नारायणपुर पुलिस द्वारा संचालित भर्ती पूर्व निःशुल्क शारीरिक प्रशिक्षण) का अवकाश दे दिया हूं।

अंत में एक मजे की बात बता देना चाहता हूं कि मैंने पृथ्वी से स्वर्ग तक का सजीव यात्रा किया है किंतु मुझे पता ही नहीं चल सका कि ये स्वर्ग किस ग्रह का नाम है? क्या यह हमारी आकाशगंगा में है? क्या सच में हमारी मिल्की-वे में ही स्वर्ग है…. या कहीं और..? यदि आप इंसान हैं तो बेशक बुद्धिमान व्यक्ति हैं, इसलिए ये आपको ही तय करना है कि ये जो आपने अभी कथा पढ़ा है वास्तव में सत्य है कि मेरे द्वारा लिखित एक रोचक षड्यंत्र???

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