
मनरेगा में मोदी सरकार के प्रस्तावित बदलाव आपके काम के संवैधानिक अधिकार पर हमला है – रेखचंद जैन
कोंडागांव – एआईसीसी एवं पीसीसी के निर्देश अनुसार सम्पूर्ण देश प्रदेश मे मनरेगा बचाओ संग्राम की शुरुआत की जा रही है जिसके तहत पीसीसी से नियुक्त प्रभारी जगदलपुर के पूर्व विधायक रेखचंद जैन ने पत्रकारों को सम्बोधित करते बताया मनरेगा को लेकर कांग्रेस पार्टी जनता के हितों मे क्या योजना बनाई है और क्यों इस आंदोलन की जरूरत पड़ी है।
1. आपका काम करने का अधिकार छीना जा रहा है
पहले : मनरेगा के तहत देश भर के प्रत्येक ग्रामीण परिवार को काम की कानूनी गारंटी प्राप्त थी। देश की किसी भी ग्राम पंचायत में किसी भी परिवार द्वारा काम माँगने पर 15 दिनों के भीतर काम उपलब्ध कराना अनिवार्य था।
अब : मोदी सरकार के इन बदलावों के बाद काम अब यह अधिकार नहीं रहेगा, बल्कि सरकार की मर्जी से बाँटी जाने वाली एक “रेवड़ी बन जाएगा। मोदी सरकार चुनेगी कि कौन-सी ग्राम पंचायतों को काम मिलेगा और किसे नहीं।
2. आपका मज़दूरी पाने का अधिकार छीना जा रहा ह
पहले : मनरेगा के तहत काम तय न्यूनतम मज़दूरी पर दिया जाता था, जिसमें हर साल बढ़ोतरी की जाती थी। साल के 365 दिन काम उपलब्ध रहता था, ताकि जरूरत पड़ने पर परिवारों के पास कमाई का विकल्प हमेशा मौजूद रहे।
अब : मोदी सरकार के इन बदलावों के तहत मज़दूरी मनमाने ढंग से तय की जाएगी, न तो न्यूनतम मज़दूरी की कोई गारंटी होगी और न ही हर साल बढ़ोतरी का कोई गारंटी। फसल कटाई के मौसम में काम की अनुमति नहीं होगी, जिससे मज़दूरों की अन्य काम देने वालों से बेहतर मजदूरी की माँग करने की ताक़त कमज़ोर होगी और उन्हें बिना न्यूनतम मज़दूरी के, जो भी काम मिलेगा उसे स्वीकार करने को मजबूर किया जाएगा।
3. आपकी ग्राम पंचायत की शक्तियां ठेकेदारों को सौंपी जा रही हैं
पहले : मनरेगा के तहत ग्राम पंचायतों को अपने गाँव के विकास के लिए विभिन्न कार्यों में मज़दूरों को नियोजित करने का अधिकार था। विकास कार्यों की योजना और सिफारिश ग्राम पंचायतों और ग्राम सभाओं द्वारा की जाती थी। ठेकेदारों पर प्रतिबंध था-मनरेगा का काम गाँव के विकास के लिए होता था। मज़दूरों को स्थानीय मनरेगा मेट्स का सहयोग मिलता था।
अब : मोदी सरकार के इन बदलावों के बाद सभी फैसले दिल्ली से रिमोट कंट्रोल के जरिये लिए जाएंगे। विकास परियोजनाएँ कुछ सीमित श्रेणियों तक सिमट जाएँगी और योजना से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय मोदी सरकार लेगी। ग्राम पंचायत अपना अधिकार खो देगी और केवल मोदी सरकार के आदेशों को लागू करने वाली एजेंसी बनकर रह जाएगी। ठेकेदारों को लाया जाएगा, और मज़दूरों को ठेकेदारों की परियोजनाओं के लिए लेबर सप्लाई में बदल दिया जाएगा। स्थानीय कार्यों के लिए मनरेगा मेट्स नहीं होंगे।
4. आपकी राज्य सरकार को कमजोर किया जा रहा है और उस पर आर्थिक बोझ डाला जा रहा है
पहले : मनरेगा के तहत आपकी मज़दूरी का 100% भुगतान केंद्र सरकार करती थी, इसलिए राज्य सरकारें बिना किसी कठिनाई के काम उपलब्ध करा पाती थीं।
अब : राज्य सरकारों को आपकी मज़दूरी का 40% हिस्सा स्वयं वहन करना होगा। खर्च बचाने के लिए संभव है कि वे काम बिल्कुल भी न दें।
मनरेगा पिछले 20 वर्षों से भारत के मजदूरों की जीवनरेखा रही है
कोविड-19 महामारी के दौरान, जब मोदी सरकार ने बिना किसी योजना के लॉकडाउन लागू कर दिया, उसके चलते लाखों प्रवासी मज़दूर घर लौटने को मजबूर हुए और काम से वंचित हो गए। ऐसे समय में मनरेगा ने 4.6 करोड़ परिवारों को रोज़गार दिया था।
2006 में लागू होने के बाद से अब तक मनरेगा के तहत कुल मिलाकर 180 करोड़ से अधिक कार्य-दिवस सृजित किए जा चुके हैं।
मनरेगा के तहत लगभग 10 करोड़ परिसंपत्तियों का निर्माण किया गया, जिनमें गाँवों के तालाब और ग्रामीण सड़कें शामिल हैं।
CAG ऑडिट सहित 200 से अधिक अध्ययनों ने यह दिखाया है कि मनरेगा देश की सबसे प्रभावी और सफल योजनाओं में से एक है।
मोदी सरकार का अब तक का रिकॉर्ड उसकी मंशा को साफ दिखाता है
योजना के तहत घोषित मज़दूरी में मोदी सरकार के 11 वर्षों के दौरान मुश्किल से ही कोई बढ़ोतरी हुई है।
उच्च महँगाई के बावजूद पिछले तीन वर्षों से मनरेगा के बजट में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है।
मज़दूरों को भुगतान में बहुत ज्यादा देरी होती रही है। असल में, लंबे समय तक भुगतान में हुई देरी के कारण मनरेगा के वार्षिक बजट का लगभग 20% हिस्सा पिछले वर्षों के बकाये चुकाने में ही चला जाता है।
हाज़िरी और कार्यों के डिजिटल सत्यापन के लिए नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (NMMS) ऐप लागू करने और आधार-आधारित भुगतान प्रणाली (ABPS) को अनिवार्य करने से 2 करोड़ मज़दूरों से काम का अधिकार और उनकी वाजिब मज़दूरी छिन गई है।
मोदी सरकार ने अब काम के कानूनी अधिकार को ही समाप्त कर दिया है-जो मज़दूरों के लिए आख़िरी सुरक्षा कवच था।
इसलिए ‘125 दिन’ का प्रावधान महज़ एक जुमला है। मोदी सरकार का अब तक का रिकॉर्ड साफ़ दिखाता है कि उसकी मंशा इस योजना को केवल ध्वस्त करने की ही है।
मनरेगा में बदलाव करने वाले नए कानूनों के खतरे
बेरोज़गारी में वृद्धि
न्यूनतम मज़दूरी दिए बिना लोगों का श्रम के लिए शोषण
शहरों की ओर मजबूरी में होने वाले पलायन में वृद्धि
पंचायतों की शक्तियाँ, अधिकार और प्रासंगिकता समाप्त हो जाएगी
मनरेगा बचाओ संग्राम की चार माँगें
काम की गारंटी, मज़दूरी की गारंटी, जवाबदेही की गारंटी
मनरेगा में किए गए बदलावों की तत्काल वापसी
काम के संवैधानिक अधिकार की पूर्ण बहाली
न्यूनतम वेतन 400 रुपये
12 जनवरी से 29 जनवरी, 2026 के बीच आयोजित किए जाने वाले कार्यकलापों की सूची
प्रत्येक ग्राम पंचायत में ग्राम प्रधानों, ग्राम पंचायत सदस्यों, मनरेगा साथी और नरेगा मज़दूरों की भागीदारी के साथ पंचायत-स्तरीय चौपालों का आयोजन।
कांग्रेस अध्यक्ष एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष द्वारा हस्ताक्षरित पत्र को ग्राम प्रधानों, पूर्व ग्राम प्रधानों, रोज़गार सेवकों और मनरेगा मज़दूरों तक पहुँचाना।
प्रत्येक गाँव में सोनिया गांधी का मनरेगा मज़दूरों के नाम वीडियो संदेश सार्वजनिक रूप से दिखाना ।
नारों की दीवार पेंटिंग (समन्वय समिति द्वारा जारी की जाएगी)।
26 जनवरी को काम के अधिकार की रक्षा और मनरेगा के संरक्षण की मांग करते हुए ग्राम सभा प्रस्तावों का पारित करवाना।
AICC समन्वय समिति द्वारा दिए जाने वाले निर्देशों के अनुरूप काम मांगो अभियान।
मनरेगा के समर्थन में नारों के साथ गाँव-स्तरीय प्रभात फेरी।
मनरेगा मज़दूरों द्वारा भारत के राष्ट्रपति को मनरेगा की पुनः बहाली की मांग करते हुए हस्ताक्षरित पोस्टकार्ड भेजना।
विधानसभा-स्तरीय नुक्कड़ सभाएँ।
AICC समन्वय समिति द्वारा निर्धारित की जाने वाली अन्य गतिविधियाँ।
प्रेसवार्ता के दौरान जिलाध्यक्ष रवि घोष,पूर्व विधायक केशकाल संतराम नेताम,पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष देवचंद मतलाम,पूर्व जिलाध्यक्ष झूमूकलाल दीवान,संतोष सिँह,महामंत्री द्वय जेपी यादव रितेश पटेल, बिरस साहू,सकुर खान,मँहगु मरकाम,ब्रम्हा मरकाम,शिवलाल मंडावी,नरेन्द्र देवांगन, कमलेश दुबे, तरुण गोलछा, विशाल शर्मा,जेठू मंडावी,देवेंद्र कोर्राम सहित कांग्रेस जन मौजूद रहे।









