
रतनपुर – भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि पर मनाया जाने वाला बहुला चतुर्थी पर्व रतनपुर में इस बार भी आस्था, ममता और संस्कृति का जीवंत प्रतीक बन गया।
यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय बहुला गाय की कथा से जुड़ा है, जो अपने बछड़े को बचाने के लिए कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धर्म के मार्ग से नहीं डगमगाई। इसी त्याग और प्रेम की स्मृति में, माताएं इस दिन अपने बच्चों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

भोर होते ही रतनपुर महामाया पारा की गलियां पूजा की तैयारी में जुटी महिलाओं से भर गईं। इस अवसर पर राजेश्वरी दुबे,लीना दुबे,मनीषा दुबे,कल्याणी त्तिवारी,हेमा शर्मा, विजेता शर्मा,रिंकी दुबे,अनुभा पांडे,हेमा थवाईत,स्वाति दुबे,उपस्थित थी जो कोई तालाब से स्नान कर लौटी, तो कोई पूजा की थाली में फूल और अक्षत सजा रही थी। घर के आंगन में महिलाएं मिट्टी से सुंदर गाय-पहाड़ गढ़ रही थीं— मानो बचपन की माटी फिर से हाथों में आकर जीवंत हो गई हो।
परंपरा की गर्माहट——
बुजुर्ग महिलाएं बच्चों को बहुला की कथा सुना रही थीं—
“बेटा, सच्चा धर्म वही है जिसमें अपने से पहले दूसरों का भला सोचा जाए।”
दीपक की हल्की लौ, मंत्रोच्चारण की गूंज और ताजे पकवानों की सुगंध पूरे मोहल्ले को एक पवित्र, स्नेहमयी आभा में लपेटे हुए थी।
महिलाओं के भावुक शब्द——–/
राजेश्वरी दुबे ——-– “हम सालों से यह व्रत करते आ रहे हैं। यह सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि अपने बच्चों के लिए मां के दिल से निकली दुआ है, जिसे अगली पीढ़ी को भी सौंपना हमारा कर्तव्य है।”
हेमा थवाईत ——–– “आज के समय में भले ही लोग भागदौड़ में त्योहार भूल जाएं, लेकिन ऐसे पर्व हमें अपनी जड़ों, संस्कृति और बच्चों से जोड़े रखते हैं। यह सिर्फ एक दिन का व्रत नहीं, बल्कि रिश्तों को मजबूत करने का पर्व है।”
समापन की आभा———
शाम को महिलाओं ने एक साथ आरती गाई— “गाय हमारी माता है…”दीपक की कतारें मिट्टी के गाय-पहाड़ के चारों ओर जल उठीं। आशीर्वाद के शब्द हवा में घुल गए—
“तेरा बेटा खुश रहे, लंबी उम्र पाए…”









