
रतनपुर राज्य का इतिहास’ पुस्तक का हुआ लोकार्पण, इतिहासकारों को मिला राज्य स्तरीय सम्मान
रतनपुर:—
छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक नगरी रतनपुर में रविवार को एक गरिमामय आयोजन के माध्यम से उस सांस्कृतिक चेतना को नई दिशा दी गई, जिसकी जड़ें कल्चुरि राजवंश, प्राचीन मंदिरों और ऐतिहासिक धरोहरों में गहराई से जुड़ी हुई हैं। अवसर था छत्तीसगढ़ के महान साहित्य मनीषी, इतिहासकार बाबू प्यारेलाल गुप्त जी की 134वीं जयंती का, जिसे सृजन पीठ रतनपुर द्वारा आयोजित व्याख्यान माला एवं पुस्तक विमोचन समारोह के रूप में मनाया गया।मुख्य अतिथि डॉ. रमेन्द्र मिश्र, जो कि छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित इतिहासकार हैं, ने अपने ओजस्वी वक्तव्य में कहा –— “रतनपुर की ऐतिहासिक परंपरा केवल स्मृति नहीं, यह हमारी सांस्कृतिक पहचान है। इसका संरक्षण हमारे समाज का नैतिक उत्तरदायित्व है।”
उन्होंने रतनपुर की पुरा संपदा, कल्चुरियों की शासन व्यवस्था, तथा यहां की ऐतिहासिक निरंतरता को संदर्भित करते हुए संरक्षण पर बल दिया।कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ता डॉ. जी. एल. रायकवार ने की। उन्होंने अपने वक्तव्य में कंठी देवल मंदिर में उत्कीर्ण लिंगोद्भव शिव प्रतिमा तथा हाथीकिला में स्थित रावण की शिल्पित प्रतिमा का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि “इन दुर्लभ शिल्पों में न केवल धार्मिक आस्था है, बल्कि एक समृद्ध कलात्मक परंपरा भी सजीव है।”विशिष्ट अतिथि विजय कुमार गुप्ता (वरिष्ठ साहित्यकार, बिलासपुर) ने रतनपुर के मंदिरों, प्राचीन जल संरचनाओं एवं सरोवरों की ऐतिहासिक उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “रतनपुर की हर धरोहर इतिहास की एक जीवित किताब है।”डॉ. सुनील जायसवाल ने अपने संबोधन में कहा कि “इतिहास केवल संग्रहालयों में नहीं बसता, वह हमारे गाँव, नगर और संस्कारों में मौजूद रहता है। रतनपुर जैसे नगरों का इतिहास समाज के स्तर पर सहेजने की जरूरत है।”
‘रतनपुर राज्य का इतिहास’ का लोकार्पण
इस आयोजन में बाबू प्यारेलाल गुप्त द्वारा वर्ष 1944 में लिखित, तथा सृजन पीठ द्वारा पुनः प्रकाशित की गई ऐतिहासिक कृति ‘रतनपुर राज्य का इतिहास’ का लोकार्पण मुख्य अतिथि एवं अध्यक्ष द्वारा किया गया। यह ग्रंथ रतनपुर के राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का दस्तावेज है, जिसे अब नई पीढ़ी के लिए सुलभ बनाया गया है।
गौरव सम्मान से विभूषित हुए इतिहास पुरुष
समारोह में डॉ. रमेन्द्र मिश्र को ‘छत्तीसगढ़ इतिहास गौरव सम्मान’ तथा डॉ. जी. एल. रायकवार को ‘छत्तीसगढ़ पुरा गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया गया। उन्हें शाल, श्रीफल एवं अभिनंदन पत्र प्रदान कर सृजन पीठ द्वारा कृतज्ञता व्यक्त की गई।
ऐतिहासिक वातावरण में हुआ आयोजन
कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुई। सृजन पीठ के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र कुमार वर्मा ने स्वागत भाषण में कहा कि “बाबू प्यारेलाल गुप्त न केवल रतनपुर के इतिहास के सजग लेखक थे, बल्कि वे उस विरासत के प्रहरी भी थे।”
कार्यक्रम का संचालन ब्रजेश श्रीवास्तव ने संयत और साहित्यिक अंदाज़ में किया।
यह आयोजन केवल एक जयंती समारोह नहीं था, बल्कि यह रतनपुर की ऐतिहासिक चेतना को पुनः जीवंत करने वाला क्षण था। इतिहासकारों, साहित्यकारों और पुरातत्व प्रेमियों की यह संगोष्ठी रतनपुर के नाम एक प्रेरक संदेश छोड़ गई — इतिहास को केवल पढ़ा नहीं जाता, उसे जिया भी जाता है।








