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कोटा महिला बाल विकास परियोजना में भ्रष्टाचार के आरोप, जांच दल पर भी उठे सवाल

“संभागीय जिला ब्यूरो रवि राज रजक की रिपोर्ट”
“संभागीय जिला ब्यूरो रवि राज रजक की रिपोर्ट”

आरोपी कार्यकर्ता ललिता यादव सुपरवाइजर की असिटेंट, जांच दल के सामने अपने और सुपरवाइजर के पक्ष में लिखवाती रही बयान।

सुपरवाइजर के पक्ष में बयान देने वाले कार्यकर्ताओ को कार्यालय के अंदर बैठाकर बी आई पी ट्रीटमेंट और शिकायत कर्ताओं को भरी दोपहर में ऑफिस के बाहर खड़ा रखा गया। पीने के पानी तक कि ब्यवस्था नही।

जाँच दल भी बेलगहना पहले नब्ज टटोलने दबे पांव पहुँचा,लोगो ने पूछा यह कौन सा नया तरीका है जांच का।

बेलगहना – महिला बाल बिकास परियोजना कोटा के बेलगहना सेक्टर की सुपरवाइजर कीर्ति किरण नोगरे पर व इनकी असिस्टेंट ललिता यादव पर भ्रस्टाचार से संबंधित पैसे के लेनदेन,दुर्व्यवहार से सम्बंधित शिकायत आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के द्वारा एसडीएम कोटा,महिला बाल बिकाश परियोजना कोटा की परियोजना अधिकारी सुरुचि श्याम, व जिला परियोजना /कार्यक्रम अधिकारी बिलासपुर से की गई थी।
जिसके संबंध में तीन सदस्यी जाँच टीम गठित की गई लेकिन यह जाँच दल 17 अप्रैल को बिना सूचना के बेलगहना पहुँच कर शिकायत कर्ता, कार्यकर्ताओं को समझाने डराने पहुँच गए और एक आंगनबाड़ी केंद्र में बैठा कर कार्यकर्ताओं को भय पूर्बक समझाने की कोशिश की। सूचना मिलने पर कुछ जनप्रतिनिधियों के पहुचने से पूछने पर कहा कि हम अभी ऐसे ही मिलने आये है और वंहा से चलते बने। इस पूरे घटना क्रम में कोटा परियोजना अधिकारी साथ रही, सुपरवाइजर को बचाने की कोशिश की जाती रही।

कार्यकर्ताओं ने बताया कि 21 अप्रैल को कोटा परियोजना ऑफिस में पाँच शिकायत करने वाली कार्यकर्ताओं को बयान देने के लिए 12 बजे बुलाया गया,जबकी परियोजना अधिकारी सुरुचि श्याम के द्वारा 20 अप्रैल की रात में नोटिस व्हाट्सअप में भेजी गई। यह किसी भी जांच नियम के खिलाफ है सूचना कम से कम एक दिन पहले देनी चाहिए,जिससे आने का समय सेट किया जा सके। दूसरा बेलगहना सेक्टर का मामला है तो जाँच टीम को नियमतः बेलगहना में आकर जाँच करना था। सभी शिकायत कर्ताओं से कार्यकर्ता,जनप्रतिनिधियों से बयान लेना था।

कार्यकर्ताओं को जाँच के नाम पर दिनभर इस भीषण गर्मी में बाहर खड़ा रखा गया वहीं अधिकरी अंदर कूलर की हवा में बैठे एक एक कार्यकर्ता से दो दो घंटे पूछताछ करते रहे जिससे कार्यकर्ता परेशान हो गए उसी उसी सवाल को कई बार पूछने पर कार्यकर्ताओ ने कहा कि ऐसा करना परोक्ष रूप से जांच प्रभावित करने का प्रयास है।बयान में जांच अधिकारियों ने क्या लिखा है पढ़ने के लिए एक प्रति कार्यकर्ताओं को नही दी हस्ताक्षर कराकर अपने पास रख लिए। कार्यकर्ताओ का आरोप है क़ि
सुपरवाइजर को बचाने के लिए अपने पक्ष की कार्यकर्ताओं को पहले सुबह से ही बुला कर सुपरवाइजर कीर्ति किरण नोगरे के पक्ष में बयान लिखवा कर रख लिया गया है।
उन कार्यकर्तों को अंदर बुलाकर परियोजना अधिकारी कार्यालय में नास्ता कराया गया इधर शिकायत कर्ता कार्यकर्ताओं को धूप में खड़ा रख कर मानवीयता के सारे नियम तोड़ दिए गए।

साम 6 बजे तक शिकायत कर्ता पांच कार्यकर्ताओ को रोके रखा गया, और अंत मे केकराडीह की कार्यकर्ता सुनीता श्याम को साम को लगभग 5.30 बजे बयान लेने से मना कर दिया गया और कहा गया कि तुम बाद में बिलासपुर आना बयान देने। यह कार्यकर्ता अपने साथियों के साथ दिन भर धूप गर्मी में भूखी प्यासी बैठे अपनी बारी का इंतजार करती रही अंत मे बिना बयान लिए इसे वापस कर दिया गया।
वही सुपरवाइजर के पक्ष में बयान देने वाली कार्यकर्ताओ को भी बुलाया गया था उनको परियोजना अधिकारी अंदर बैठा कर नास्ता करवा रही थी, जिस कथित असिस्टेंट सुपरवाइजर ललिता यादव जिसे सुपरवाइजर , नोर्गे मेडम ने सहायक बना रखा है वह भी इस मामले में आरोपी है लेकिन उसे परियोजना अधिकारी के चैंबर में सुपरवाइजर के पक्ष में बयान देने वाली कार्यकर्ताओं को बयान दिलवाते,समझाते, लिखवाते दूसरे लोगों ने देखा। क्या ऐसे ही निष्पक्ष जाँच होती है। जिसके ऊपर आरोप लगा हो वही जाँच टीम के साथ अपने पक्ष में खड़े हो कर बयान दिलवाए। जाँच दल के लिए दोनों पक्ष बराबर होना चाहिए। पर इस जांच में तो ऐसा लग रहा है कि पूरा परियोजना बिभाग एक सुपरवाइजर को बचाने में लग गया है। बिभाग और सरकार की साख पर बट्टा लगाने में लगा हुआ है। क्योकि एक कि पोल खुली तो सब की खुलेगी।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस कथित पैसे के लेनदेन से संबंधित भ्रस्टाचार के मामले में कुछ और अधिकारी संलिप्त है जिनके संरक्षण में महिला बाल विकास बिभाग में पदस्थ कर्मचारियों के माध्यम से बेखौफ यह खेल खेला जा रहा है। सायद इसी लिए इस शिकायत को पूरी तरह से दबाने की कोशिश की जा रही है।
लेकिन दूसरी तरफ महिला बाल विकास कोटा परियोजना की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े हो रहे है ? कि ऐसा क्या मोह है सुपरवाइजर के प्रति की उसको बचाने में नियम कानून को दरकिनार किया जा रहा है,
खैर यह विभागीय खेला है चलता ही रहेगा लेकिन मिल रही जानकारी के अनुसार जनता,जनप्रतिनिधि, सही जांच और सही कार्यवाई न होने के कारण आंदोलन करने को मजबूर होगे,और सारे सबूतों के साथ कोर्ट में भी जाएगे।
अब देखना यह है कि बिभाग क्या जाँच निष्कर्ष निकालता है।

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