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अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस – 29 अप्रैल 2026, बुधवार,,”नटराज की भूमि से विश्व को संदेश: नृत्य में है शांति का सूत्र”

समय न्यूज़ लाइव प्रदीप पांडेय की रिपोर्ट
समय न्यूज़ लाइव प्रदीप पांडेय की रिपोर्ट

प्रत्येक वर्ष 29 अप्रैल को विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस मनाया जाता है। यह दिन आधुनिक बैले के जनक जीन-जॉर्ज नोवेरे के जन्मदिवस पर समर्पित है और इसकी शुरुआत यूनेस्को के इंटरनेशनल थिएटर इंस्टिट्यूट द्वारा वर्ष 1982 में की गई थी। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य नृत्य कला को प्रोत्साहित करना, कलाकारों का सम्मान करना तथा समाज में नृत्य के महत्व को स्थापित करना है। नृत्य वह भाषा है जिसे शब्दों की आवश्यकता नहीं होती। यह आत्मा की अभिव्यक्ति, भावों का प्रवाह और संस्कृति का दर्पण है। भारत की भूमि तो नृत्य की जन्मस्थली कही जाती है, जहाँ स्वयं भगवान शिव नटराज के रूप में ब्रह्मांडीय नृत्य करते हैं। उनका तांडव सृष्टि के संहार और सृजन दोनों का प्रतीक है। भरत मुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र नृत्य का संपूर्ण विज्ञान प्रस्तुत करता है। कथक, भरतनाट्यम, कथकली, ओडिसी, कुचिपुड़ी, मणिपुरी, सत्रिया और मोहिनीअट्टम जैसी आठ शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ हमारी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर हैं। कथक के घुंघरू जब बोलते हैं तो इतिहास की कहानियाँ जीवंत हो उठती हैं, वहीं भरतनाट्यम की मुद्राएं वेद-मंत्रों सी पवित्र प्रतीत होती हैं। कथकली का श्रृंगार और अभिनय दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है, तो ओडिसी की त्रिभंग मुद्रा में पत्थर की मूर्तियाँ भी सजीव लगती हैं।

शास्त्रीय नृत्य के साथ-साथ हमारे लोकनृत्य भी मिट्टी की सुगंध लिए हुए हैं। गरबा, भांगड़ा, घूमर, बिहू, लावणी और छाऊ जैसे नृत्य प्रत्येक राज्य की अपनी पहचान बताते हैं। नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह किसी सीमा को नहीं मानता। यह जाति, धर्म, भाषा और देश की दीवारों को तोड़कर दिलों को जोड़ता है। जब एक कलाकार सालसा करता है और दूसरा कथक, तब दोनों की आँखों में एक ही आनंद, एक ही लय झलकती है। नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, यह एक सम्पूर्ण साधना है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि नियमित नृत्य करने से शरीर में डोपामाइन और एंडोर्फिन जैसे हार्मोन बढ़ते हैं, जो तनाव, चिंता और अवसाद को दूर करते हैं। अल्जाइमर और पार्किंसन जैसे रोगों में भी नृत्य चिकित्सा अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुई है। बच्चों में नृत्य अनुशासन, एकाग्रता और आत्मविश्वास का विकास करता है, युवाओं को अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने का मंच देता है, तथा वृद्धों के जीवन में नई उमंग और स्फूर्ति भर देता है।

आज के समय में नृत्य सामाजिक परिवर्तन का भी सशक्त माध्यम बन गया है। स्वच्छता अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, पर्यावरण संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों को नृत्य के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है। हिप-हॉप, कंटेम्पररी, जैज़ और बैले जैसी आधुनिक शैलियों ने आज की युवा पीढ़ी को नृत्य से जोड़ा है। टेलीविजन रियलिटी शो ने गली-मोहल्ले की छुपी प्रतिभाओं को राष्ट्रीय मंच प्रदान किया है। परंतु इस आधुनिकता के बीच हमें अपनी गुरु-शिष्य परंपरा और शास्त्रीय जड़ों को नहीं भूलना चाहिए। पंडित बिरजू महाराज, रुक्मिणी देवी अरुंडेल, गुरु केलुचरण महापात्र जैसे महान गुरुओं ने अपना सम्पूर्ण जीवन इस कला को समर्पित कर दिया।

अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि युद्ध मानवता का विनाश करता है, वह घृणा, रक्तपात और पीड़ा के सिवाय कुछ नहीं देता। युद्ध कभी किसी समस्या का समाधान नहीं होता, वह केवल बर्बादी लाता है। इसके विपरीत नृत्य शांति, प्रेम और सद्भाव का संदेशवाहक है। जब शब्द मौन हो जाते हैं, जब संवाद टूट जाते हैं, तब नृत्य ही दो हृदयों को जोड़ता है। नृत्य की लय में हिंसा नहीं, करुणा है। नृत्य की थाप में विध्वंस नहीं, सृजन है। इसलिए यह दिवस हमें सिखाता है कि हमें युद्ध का नहीं, नृत्य का चुनाव करना चाहिए, क्योंकि नृत्य ही सच्चे अर्थों में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को साकार करता है।

आइए, इस 29 अप्रैल 2026, बुधवार को हम सभी संकल्प लें कि नृत्य को केवल मंच तक सीमित न रखकर अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएंगे। अपने बच्चों को किसी न किसी नृत्य शैली से अवश्य जोड़ेंगे और विद्यालयों में नृत्य शिक्षा को बढ़ावा देंगे। क्योंकि जो समाज नाचना भूल जाता है, वह धीरे-धीरे जीना भी भूल जाता है। नृत्य जीवन है, नृत्य उत्सव है, नृत्य प्रार्थना है। अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। नृत्य करते रहिए, मुस्कुराते रहिए, शांति फैलाते रहिए।

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