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बेलगहना के क्रिकेट मसीहा स्व. समर बहादुर अग्रवाल

“संभागीय जिला ब्यूरो रवि राज रजक की रिपोर्ट”
“संभागीय जिला ब्यूरो रवि राज रजक की रिपोर्ट”

“बेलगहना की मिट्टी से निकला वह हीरा, जिसने क्रिकेट को केवल खेल नहीं, बल्कि एक संस्कार बना दिया।”

बेलगहना की धरती ने अनेक प्रतिभाओं को जन्म दिया, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो स्वयं एक संस्था बन जाते हैं। ऐसे ही विलक्षण व्यक्तित्व थे — स्वर्गीय समर बहादुर अग्रवाल जी, जिन्हें पूरा बेलगहना स्नेह, अपनत्व और सम्मान से “समर भैया” कहकर पुकारता था।
बेलगहना में जब भी क्रिकेट की चर्चा होती है, सबसे पहले जिस चेहरे की स्मृति मन में उभरती है, वह समर भैया की ही होती है। उन्होंने केवल क्रिकेट नहीं खेला, बल्कि उसे जिया, उसे अपने व्यक्तित्व में उतारा और गाँव के सैकड़ों बच्चों के सपनों को अपने हाथों से आकार दिया।
क्रिकेट की पाठशाला थी उनकी छोटी-सी होटल-
बीच बस्ती में स्थित उनकी छोटी-सी होटल केवल चाय, कचौड़ी और नाश्ते की दुकान नहीं थी, बल्कि वह बेलगहना के युवाओं के लिए क्रिकेट की एक जीवंत पाठशाला थी।
उस होटल की संरचना भी अपने आप में अनोखी थी। अनेक छोटे-छोटे खंभों पर टिकी वह छत मानो क्रिकेट प्रेम की एक विराट छाया बनकर खड़ी रहती थी। प्रत्येक खंभे पर किसी न किसी महान क्रिकेट खिलाड़ी का चित्र लगा होता था। कहीं कपिल देव मुस्कुराते दिखाई देते, कहीं सुनील गावस्कर की दृढ़ता झलकती, तो कहीं मोहम्मद अजहरुद्दीन, श्रीकांत और उस दौर के अन्य महान खिलाड़ियों के पोस्टर होटल की शोभा बढ़ाते थे।
नई क्रिकेट पत्रिकाएँ, अखबारों की कटिंग, मैचों के स्कोर और खिलाड़ियों की चर्चाएँ उस स्थान को एक साधारण होटल से कहीं ऊपर उठा देती थीं। वहाँ बैठने वाला हर बच्चा ग्राहक नहीं, बल्कि क्रिकेट का विद्यार्थी होता था।
समर भैया अपनी होटल मालिक की गद्दी पर बैठे हुए किसी अनुभवी अंपायर की तरह पूरे माहौल पर नजर रखते थे। बच्चे चाय और कचौड़ी का आनंद लेते हुए क्रिकेट पर चर्चा करते, और पूरा वातावरण ऐसा प्रतीत होता मानो कोई क्रिकेट मैदान जीवंत होकर बस्ती के बीच उतर आया हो। यदि उस होटल को “क्रिकेट की पाठशाला” कहा जाए, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी; और उस पाठशाला के प्रधानाचार्य स्वयं समर भैया थे।
पहले स्वयं खेले, फिर सैकड़ों खिलाड़ियों को गढ़ दिया ।
समर भैया स्वयं भी उत्कृष्ट क्रिकेट खिलाड़ी रहे। मैदान में उनका खेल जितना प्रभावशाली था, मैदान के बाहर उनकी दृष्टि उससे कहीं अधिक व्यापक थी। धीरे-धीरे उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन बेलगहना के क्रिकेट और युवाओं के निर्माण को समर्पित कर दिया।
वे बाउंड्री लाइन के बाहर बैठकर हर गेंद, हर खिलाड़ी और हर परिस्थिति को बड़ी बारीकी से देखते थे। किस खिलाड़ी को किस क्रम पर खिलाना चाहिए, कौन बच्चा आगे चलकर अच्छा बल्लेबाज बनेगा, किसमें तेज गेंदबाजी की क्षमता है — यह सब वे अद्भुत सूझबूझ से समझ लेते थे।
उन्होंने केवल खिलाड़ी नहीं बनाए, बल्कि बच्चों में आत्मविश्वास, अनुशासन और खेल भावना का विकास किया।
खेल ही उनका धर्म था
समर भैया के लिए जीत और हार से कहीं बड़ा था — खेल का सम्मान।
वे हमेशा कहते थे कि “अच्छा खेलना ही सबसे बड़ी जीत है।” यदि कोई खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करता, तो चाहे वह बेलगहना का हो या किसी दूसरे गाँव का, समर भैया खुले हृदय से उसकी प्रशंसा करते थे।
हार मिलने पर वे खिलाड़ियों को निराश नहीं होने देते थे। वे समझाते थे कि कमी कहाँ रह गई और अगली बार बेहतर कैसे खेला जा सकता है। यही कारण था कि पूरे अंचल के खिलाड़ी उनका नाम अत्यंत आदर और सम्मान के साथ लेते थे।
गरीब खिलाड़ियों के सबसे बड़े सहारा-
उनकी होटल अच्छी चलती थी, लेकिन उसकी कमाई केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहती थी। उसका बड़ा हिस्सा गाँव के बच्चों के क्रिकेट और उनके सपनों पर खर्च होता था।
यदि टीम के पास के बैट नहीं होता, उसके लिए बैट आ जाता। जिसके पास पैड, ग्लव्स या गेंद खरीदने के पैसे नहीं होते, उसकी व्यवस्था समर भैया कर देते। कई बच्चों को उनकी होटल में चाय-नाश्ता बिना पैसे के मिल जाता था।
यदि किसी बच्चे को बाहर टूर्नामेंट खेलने जाने की अनुमति घर से नहीं मिलती थी, तो समर भैया स्वयं उसके घर पहुँच जाते और अभिभावकों से कहते —
“चिंता मत कीजिए, मैं साथ जा रहा हूँ… बच्चे को भेज दीजिए।”
वे केवल मार्गदर्शक नहीं थे, बल्कि खिलाड़ियों के संरक्षक, अभिभावक और प्रेरणास्रोत थे।
एक व्यक्ति जिसने पूरे गाँव की खेल संस्कृति बदल दी
समर भैया ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि एक व्यक्ति सच्चे मन से किसी उद्देश्य के लिए समर्पित हो जाए, तो वह पूरे गाँव की दिशा बदल सकता है।
उनके समय में बेलगहना की क्रिकेट टीम पूरे क्षेत्र में अपनी अलग पहचान रखती थी। अनेक खिलाड़ी आज भी स्वीकार करते हैं कि यदि समर भैया का मार्गदर्शन और संरक्षण न मिला होता, तो शायद वे कभी मैदान तक भी नहीं पहुँच पाते।
उन्होंने बेलगहना को केवल क्रिकेट खेलने वाला गाँव नहीं बनाया, बल्कि खेल भावना से जुड़ा हुआ एक परिवार बना दिया।
वे आज नहीं हैं, लेकिन हर मैदान में जीवित हैंl
आज समर भैया हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं हैं, लेकिन बेलगहना का हर क्रिकेट मैदान, हर टूर्नामेंट और हर पुराना खिलाड़ी उनकी स्मृतियों से भरा हुआ है।
उनकी होटल वाली जगह से गुजरते हुए आज भी ऐसा प्रतीत होता है मानो वहाँ से क्रिकेट की कहानियाँ हवा में घुलकर पूरे गाँव में फैल रही हों।
उन्होंने केवल क्रिकेट को आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि बेलगहना की पहचान को खेल के माध्यम से नई ऊँचाई प्रदान की।
स्वर्गीय समर बहादुर अग्रवाल जी जैसे लोग कभी वास्तव में विदा नहीं होते। वे अपने कार्यों, संस्कारों और प्रेरणाओं के माध्यम से पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।
बेलगहना का क्रिकेट इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें समर भैया का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।

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