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बेलगहना के दानवीर मुरली सेठ : सेवा, परोपकार और दूरदर्शिता की अमर गाथा

“संभागीय जिला ब्यूरो रवि राज रजक की रिपोर्ट”
“संभागीय जिला ब्यूरो रवि राज रजक की रिपोर्ट”

बेलगहना के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने अपने कर्म, त्याग और लोककल्याण की भावना से स्वयं को जनमानस के हृदय में अमर कर लिया। ऐसी ही महान विभूतियों में एक नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है—दानवीर  मुरली सेठ। वर्तमान में जिस प्रतिष्ठित व्यापारिक प्रतिष्ठान को “बद्रीदास मुरलीधर” फर्म के नाम से जाना जाता है, उसके आधार स्तंभ  मुरली सेठ ही थे। वे बेलगहना के सुप्रसिद्ध समाजसेवी स्वर्गीय शिवसेवक अग्रवाल (सेवा सेठ जी) के पूज्य पिता थे।
लगभग साठ-सत्तर वर्ष पूर्व बेलगहना में उनकी कपड़े की एक प्रतिष्ठित दुकान हुआ करती थी। वे केवल एक सफल व्यापारी ही नहीं, बल्कि अत्यंत मिलनसार, सरल, सौम्य और उदार हृदय के व्यक्ति भी थे। उनकी दुकान व्यापार का केंद्र होने के साथ-साथ सामाजिक संवाद और जनसंपर्क का भी महत्वपूर्ण स्थल थी। उनकी आत्मीयता और विनम्रता ने उन्हें बेलगहना की सर्वाधिक सम्मानित हस्तियों में स्थान दिलाया।
मुरली सेठ का जीवन इस सत्य का प्रमाण था कि धन का वास्तविक महत्व उसके संचय में नहीं, बल्कि समाज के कल्याण में उसके सदुपयोग में निहित है। उन्होंने अपने जीवनकाल में दान और लोकसेवा की ऐसी मिसालें स्थापित कीं, जिन्हें आज भी बेलगहना के लोग श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।
उनकी सबसे उल्लेखनीय देन “मुरली तालाब” है। उस समय जलस्रोतों की कमी ग्रामीण जीवन की एक बड़ी समस्या थी। इस कठिनाई को देखते हुए उन्होंने एक विशाल तालाब के निर्माण का संकल्प लिया। कहा जाता है कि वे स्वयं लोटे में पैसे लेकर निर्माण स्थल पर पहुँचते थे और लोगों को इस लोकहितकारी कार्य में सहयोग देने के लिए प्रेरित करते थे। वे केवल आर्थिक सहायता ही नहीं देते थे, बल्कि श्रमदान और जनसहभागिता का भी उत्साहवर्धन करते थे। उनके अथक प्रयासों से निर्मित यह तालाब वर्षों तक क्षेत्र की जल आवश्यकताओं की पूर्ति करता रहा। आज भी यह तालाब “मुरली तालाब” के नाम से उनकी स्मृतियों को जीवित रखे हुए है।
मानव सेवा के प्रति उनकी संवेदनशीलता का एक और महत्वपूर्ण उदाहरण बेलगहना से कोंनचरा मार्ग पर निर्मित वह कुआँ है, जिसने वर्षों तक राहगीरों की प्यास बुझाई। उस समय इस मार्ग के बीच लंबा निर्जन क्षेत्र था, जहाँ न तो कोई बस्ती थी और न ही पेयजल की व्यवस्था। यात्रियों को विशेषकर गर्मी के दिनों में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। जब  मुरली सेठ को इस समस्या की जानकारी मिली, तब उन्होंने वहाँ एक कुएँ का निर्माण करवाया। यह कुआँ असंख्य लोगों के लिए जीवनदायी सिद्ध हुआ और मानव सेवा के प्रति उनके समर्पण का मौन साक्षी बन गया।
धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में भी उनका योगदान अविस्मरणीय है। बेलगहना के बाजार स्थित प्रसिद्ध राधा-कृष्ण मंदिर के लिए भूमि दान करने का श्रेय भी  मुरली सेठ को जाता है। उनके द्वारा प्रदान की गई भूमि पर आज यह सुंदर मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इसी प्रकार अरपा नदी के तट पर स्थित प्राचीन शिव मंदिर के निर्माण हेतु भी उन्होंने भूमि दान की थी। उनके इस दान ने बेलगहना को एक ऐसा आध्यात्मिक केंद्र प्रदान किया, जहाँ आज भी श्रद्धालु बड़ी संख्या में दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुँचते हैं। यह शिव मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि श्री मुरली सेठ की उदारता और धर्मनिष्ठा का भी जीवंत स्मारक है।
उनके दान कार्यों में सबसे महत्वपूर्ण योगदानों में से एक था बेलगहना के लिए श्मशान भूमि का दान। उस समय अंतिम संस्कार के लिए कोई स्थायी स्थान उपलब्ध नहीं था। लोग नदी के बीच रेत पर शवदाह करते थे। सामान्य दिनों में भी यह व्यवस्था असुविधाजनक थी, किंतु वर्षा ऋतु में स्थिति अत्यंत कठिन और पीड़ादायक हो जाती थी। समाज की इस आवश्यकता को समझते हुए श्री मुरली सेठ ने अपनी भूमि का एक महत्वपूर्ण भाग श्मशान के लिए दान कर दिया। आज भी बेलगहना की श्मशान भूमि उसी दान की अमूल्य विरासत है।
मुरली सेठ की दूरदर्शिता केवल जल संरक्षण और सामाजिक सेवा तक सीमित नहीं थी। नदी किनारे स्थित “मुरली कछार” उनकी पर्यावरणीय चेतना और प्रकृति प्रेम का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने उस क्षेत्र में वृक्षारोपण कर हरित संपदा को बढ़ावा दिया तथा अपने प्रयासों से एक बड़े भू-भाग को उपजाऊ और उपयोगी भूमि में परिवर्तित किया। उनकी यह सोच केवल वर्तमान तक सीमित नहीं थी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के कल्याण को ध्यान में रखकर विकसित की गई थी।
बेलगहना के विकास की दिशा में उनका योगदान यहीं समाप्त नहीं होता। उन्होंने क्षेत्र में कोल्ड स्टोरेज जैसी उपयोगी योजनाओं के लिए भी भूमि उपलब्ध कराई। उनके द्वारा प्रदान किए गए संसाधनों ने क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने यह सिद्ध किया कि एक जागरूक और संवेदनशील नागरिक अपनी संपत्ति का उपयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज के व्यापक हित के लिए भी कर सकता है।
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने कभी अपने दान और सेवा का प्रदर्शन नहीं किया। उनका परोपकार निस्वार्थ था, उनका जीवन सादगीपूर्ण था और उनका उद्देश्य केवल समाज का कल्याण था। उन्होंने अपने आचरण से लोगों को सिखाया कि दान केवल धन देना नहीं है, बल्कि समाज की आवश्यकताओं को समझकर उनके समाधान के लिए आगे बढ़ना ही सच्ची मानवता है।
मुरली तालाब, मुरली कुआँ, राधा-कृष्ण मंदिर, शिव मंदिर, मुरली कछार और श्मशान भूमि आज भी उनके लोकहितकारी कार्यों की अमिट पहचान बने हुए हैं। उनके कार्यों से प्रेरित होकर बेलगहना के अनेक लोगों ने भी समाजसेवा और दान की परंपरा को आगे बढ़ाया।
दुर्भाग्यवश मुझे अपने जीवनकाल में  मुरली सेठ को देखने का अवसर नहीं मिला। किंतु बुजुर्गों से सुनी गई उनकी स्मृतियाँ, उनके कार्यों से जुड़ी जनश्रुतियाँ और आज भी विद्यमान उनकी अमर कृतियाँ यह विश्वास दिलाती हैं कि वे केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि मानवता, करुणा और सेवा के साक्षात स्वरूप थे।
बेलगहना की धरती सदैव उनके उपकारों की ऋणी रहेगी। जब भी मुरली तालाब का जल लहराएगा, मुरली कछार की हरियाली मुस्कुराएगी, शिव मंदिर की घंटियाँ गूंजेंगी, राधा-कृष्ण मंदिर में आरती होगी और श्मशान भूमि समाज की सेवा करती रहेगी, तब-तब इस महान दानवीर की स्मृतियाँ जनमानस में पुनः जीवंत हो उठेंगी। ऐसे लोकनायक, समाजसेवी, धर्मप्रेमी, पर्यावरण प्रेमी और दानवीर  मुरली सेठ को बेलगहना की ओर से शत-शत नमन।

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