
बिलासपुर…छत्तीसगढ़ शासन ने मछलियों के प्रजनन काल को देखते हुए 16 जून से 15 अगस्त तक नदियों, नालों और जलाशयों में मछली पकड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है। लेकिन बिलासपुर की अरपा नदी और ग्रामीण क्षेत्रों के कई तालाबों में यह प्रतिबंध केवल कागजों तक सीमित नजर आ रहा है। खुलेआम लोग जाल डालकर मछलियां पकड़ रहे हैं, जबकि जिम्मेदार विभाग और अधिकारी मूकदर्शक बने हुए हैं।
अरपा नदी के किनारों और ग्रामीण इलाकों के तालाबों में प्रतिबंध अवधि के दौरान भी बड़ी संख्या में लोग मछली पकड़ते दिखाई दे रहे हैं। शासन का स्पष्ट आदेश होने के बावजूद न तो व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया गया और न ही गांव-गांव में इसकी सूचना पहुंचाई गई।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें मछली पकड़ने पर लगे प्रतिबंध की पूरी जानकारी ही नहीं है। यदि प्रशासन और मत्स्य विभाग समय रहते ग्राम पंचायतों, सरपंचों, सचिवों और कोटवारों के माध्यम से मुनादी करवाता तो लोगों तक यह संदेश आसानी से पहुंच सकता था।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल आदेश जारी करने तक ही सीमित है? क्या ग्रामीण क्षेत्रों में नियमों की जानकारी पहुंचाना विभाग की जिम्मेदारी नहीं है? यदि लोगों को नियमों की जानकारी ही नहीं होगी तो वे उनका पालन कैसे करेंगे?
ग्रामीण क्षेत्रों में न तो चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं और न ही प्रतिबंध को लेकर कोई विशेष अभियान नजर आ रहा है। नतीजा यह है कि अरपा नदी, नालों और तालाबों में लगातार मछलियों का शिकार हो रहा है, जिससे जलीय जीवों के संरक्षण और प्रजनन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
अब देखना होगा कि इस खबर के प्रसारित होने के बाद संबंधित अधिकारी हरकत में आते हैं या फिर पहले की तरह मूकदर्शक बने रहते हैं। आखिर शासन के आदेशों का पालन सुनिश्चित करना और ग्रामीणों को जागरूक करना किसकी जिम्मेदारी है? यह सवाल आज भी जवाब का इंतजार कर रहा है।









