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टोवाल ढहा, भ्रष्टाचार बहा! अरपा भैंसाझार परियोजना की सच्चाई बारिश ने खोल दी

रतनपुर से रवि ठाकुर की रिपोर्ट
रतनपुर से रवि ठाकुर की रिपोर्ट

कोटा/भैंसाझार:—-
अरपा नदी पर अरबों की लागत से बन रही सिंचाई परियोजना की पोल अब खुद बारिश ने खोल दी है। करोड़ों की लागत से बनाई गई सुरक्षा संरचना टोवाल (कटाव रोधी दीवार) इस बारिश में धराशायी हो गई। इससे यह साफ हो गया कि परियोजना निर्माण में भारी भ्रष्टाचार और लापरवाही हुई है। अब सवाल उठना लाजमी है — क्या हज़ार करोड़ रुपये की योजना सिर्फ ठेकेदारों और अधिकारियों की जेब भरने के लिए बनाई गई थी?

 

टोवाल की ढहती ईंटें बता रही भ्रष्टाचार की कहानी

भैंसाझार में नदी किनारे बनाई गई टोवाल संरचना, जिसका उद्देश्य नहरों और खेतों की सुरक्षा करना था, इस बरसात में बह गई। न तो पानी का ज्यादा दबाव था और न ही कोई प्राकृतिक आपदा — फिर भी ये दीवार टिक न सकी। स्थानीय ग्रामीणों और किसानों का साफ कहना है कि निर्माण में बेहद घटिया सामग्री का उपयोग किया गया और काम की गुणवत्ता पर कोई निगरानी नहीं रखी गई।

न बारिश की बाढ़ आई, न नदी में उफान, फिर भी दीवार क्यों गिरी?

प्रश्न यही है — जब कोई बड़ा प्राकृतिक कारण नहीं था, तब सिर्फ एक बारिश में ही यह संरचना कैसे ध्वस्त हो गई? क्या यह साबित करने के लिए और किसी जांच की जरूरत है कि भ्रष्टाचार हुआ है?

किसका मिला संरक्षण? किसने आंख मूंदी?

जल संसाधन विभाग ने ठेकेदार को पहले ही 317.59 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया है, जबकि नहर निर्माण अभी तक पूरा नहीं हुआ है। और अब जब टोवाल टूट गया, तो अधिकारियों की चुप्पी और मौन संरक्षण सीधे तौर पर सवालों के घेरे में है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि निर्माण कार्य सिर्फ कागज़ों में ही पूरा दिखाया गया और मौके पर “कामचलाऊ” ढांचा खड़ा कर पैसा निकाल लिया गया?

ग्रामीणों का गुस्सा फूटा — जांच और कार्रवाई की मांग

भैंसाझार के ग्रामीणों ने मांग की है कि बेरहमी से जनता का पैसा बर्बाद करने वाले ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही एक उच्चस्तरीय तकनीकी जांच कमेटी बनाकर पूरे प्रोजेक्ट की गुणवत्ता की जांच होनी चाहिए।

क्या अब भी चुप रहेंगे जिम्मेदार?

करोड़ों रुपये खर्च कर भी टोवाल नहीं टिक सका — यह सीधे-सीधे भ्रष्टाचार की कब्रगाह है।

अगर शुरुआत में ही सुरक्षा दीवार ध्वस्त हो गई, तो आने वाले समय में नहरें और अन्य संरचनाएं कब तक टिकेंगी?

क्या बिलासपुर, कोटा, तखतपुर और बिल्हा के हजारों किसान सिर्फ कागज़ी योजनाओं के सहारे खेती करेंगे?

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