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भादो गम्मत की fading परंपरा: रतनपुर की सांस्कृतिक विरासत संकट में

रतनपुर से रवि ठाकुर की रिपोर्ट
रतनपुर से रवि ठाकुर की रिपोर्ट

रतनपुर:—-
कभी रतनपुर की सड़कों और गलियों में गूंजने वाली बांसुरी की तान, मृदंग की थाप और कान्हा की लीलाओं से सजी ‘भादो गम्मत’ की ध्वनि आज धीमे-धीमे मौन होती जा रही है। करीब डेढ़ सौ साल पुरानी यह पारंपरिक लोक कला अब गिने-चुने मोहल्लों तक सिमट चुकी है। सांस्कृतिक विरासत का यह अनमोल धरोहर, आज विलुप्ति के कगार पर खड़ा है।

आपको बता दे कि रतनपुर में गणेश उत्सव के साथ गूंजती थी कृष्णलीला भादो मास में आयोजित होने वाली ‘भादो गम्मत’ कभी रतनपुर के गणेश उत्सव का मुख्य आकर्षण हुआ करती थी। करैहापारा, खालहेपारा, बाबूहाट, महामायापारा, बड़ीबाजार, भेड़ीमूड़ा जैसे दर्जनों मोहल्लों में इस गम्मत का आयोजन होता था। आसपास के गांवों से भारी संख्या में लोग इसे देखने आया करते थे। हफ्तों तक नगर में मेले जैसा उत्सव का माहौल रहता था।स्थानीय कलाकार भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं, पूतना वध, कंस वध और रासलीला का मंचन करते थे।

इस मंचन की खास बात यह थी कि इसमें आधुनिक संसाधनों की बजाय पारंपरिक वेशभूषा और संगीत के साथ जीवंत प्रस्तुति दी जाती थी, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती थी।
अब सिमट गई परंपरा कुछ मोहल्लों तक
समय के साथ, गम्मत के कलाकारों को सम्मान और मंच देने वाले संरक्षक एक-एक कर इस दुनिया से विदा हो गए। वहीं नई पीढ़ी की इस कला में रुचि ना होना सबसे बड़ा संकट बन गया। अब यह परंपरा सिर्फ करैहापारा के बाबूहाट और खालहेपारा जैसे कुछ इलाकों में ही बची रह गई है।

संरक्षण की दरकार

इस कला से जुड़े पुराने कलाकार आज भी इसे बचाने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन संसाधनों और सहयोग की कमी उनके हौसलों को कमजोर बना रही है। वे चाहते हैं कि रतनपुरिहा भादो गम्मत को सरकार सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता देकर संरक्षण और प्रशिक्षण की व्यवस्था करे।

नया प्रश्न खड़ा करती है पुरानी परंपरा

रतनपुर की यह विलुप्त होती लोक कला आज सिर्फ सांस्कृतिक संकट नहीं, बल्कि एक पीढ़ीगत सवाल भी बनकर सामने आई है — क्या हमारी युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से कटती जा रही है? और क्या हमारी धरोहरें सिर्फ किताबों और स्मृतियों तक ही सीमित रह जाएंगी?

निष्कर्ष में एक अपील

आज जरूरत है कि शासन, सांस्कृतिक संस्थान, और स्थानीय समाज मिलकर इस परंपरा को पुनर्जीवित करें। स्कूलों और कॉलेजों में इसके प्रशिक्षण कार्यक्रम हों, युवाओं को मंच मिले और कलाकारों को सम्मान। वरना एक दिन रतनपुरिहा भादो गम्मत सिर्फ पुराने एल्बमों और बुजुर्गों की कहानियों तक सीमित रह जाएगी।

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