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बेलगहना के एक ऐसी शख्सियत जो युवाओं के प्रेरणा बने

“संभागीय जिला ब्यूरो रवि राज रजक की रिपोर्ट”
“संभागीय जिला ब्यूरो रवि राज रजक की रिपोर्ट”

गोरेलाल रजक बेलगहना के खेलों का एक नायक

गोरेलाल रजक ने बेलगहना में कैंरम और बैडमिंटन की शुरुआत की

किसी भी गांव, कस्बे या नगर की खेल संस्कृति केवल खिलाड़ियों के दम पर जीवित नहीं रहती। उसके पीछे कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो स्वयं खेल के प्रति समर्पित होकर पूरी पीढ़ी को प्रेरणा देते हैं। वे मंच पर कम दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी मेहनत, सेवा और खेल-प्रेम हर खिलाड़ी की सफलता में झलकता है। बेलगहना के लिए ऐसे ही एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व थे — गोरेलाल रजक जी।
गोरेलाल जी केवल एक खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि खेल-भावना के सच्चे साधक थे। बेलगहना में बैडमिंटन और कैरम के वे उत्कृष्ट खिलाड़ियों में गिने जाते थे। उनके खेल में अनुशासन, सौम्यता और आत्मविश्वास का अद्भुत संगम दिखाई देता था। क्रिकेट के प्रति भी उनकी विशेष रुचि थी। उस दौर में जब गांव में खेल सुविधाएँ सीमित थीं, तब भी उन्होंने अपने उत्साह और लगन से खेलों की अलख जगाए रखी। समर बहादुर अग्रवाल जी के साथ-साथ गोरेलाल रजक जी का नाम भी बेलगहना के खेल इतिहास में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है।


उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी — निस्वार्थ सेवा। वे केवल स्वयं खेलकर संतुष्ट नहीं होते थे, बल्कि चाहते थे कि बेलगहना के युवा खिलाड़ी आगे बढ़ें, अनुशासित रहें और मैदान में अपनी अलग पहचान बनाएं। उनके व्यक्तित्व में ऐसा अपनापन था कि हर खिलाड़ी उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानता था।
गोरेलाल जी अपने पेशे में भी अद्भुत दक्षता रखते थे। उनके हाथों में जैसे जादू था। वे कपड़ों को छू देते तो उनमें नई चमक आ जाती। उनके हाथों से धुले सफेद वस्त्र इतने उजले और चमकदार हो जाते थे कि नए कपड़े भी उनके सामने फीके लगते। ऐसा प्रतीत होता था मानो सफेदी में चाँदनी उतर आई हो।


जब बेलगहना की टीम बाहर खेलने जाती, तब खिलाड़ियों की सफेद पोशाकों की जिम्मेदारी वे स्वयं उठाते। पूरी लगन और आत्मीयता से कपड़े धोते, उन्हें करीने से तैयार करते, ताकि मैदान में उतरते समय बेलगहना की टीम अनुशासन, स्वच्छता और सौंदर्य की मिसाल बन सके। सबसे प्रेरणादायक बात यह थी कि वे इस सेवा के बदले कभी कोई पारिश्रमिक नहीं लेते थे। गांव और खिलाड़ियों के प्रति उनका यह समर्पण वास्तव में अनुकरणीय था।
उन्हें सबसे अधिक प्रसन्नता तब होती थी जब खिलाड़ी साफ-सुथरी सफेद पोशाक पहनकर मैदान में उतरते और लोग बेलगहना टीम की प्रशंसा करते। उनके लिए यही सबसे बड़ा पुरस्कार था। वे मानते थे कि खेल केवल जीत और हार का नाम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण, अनुशासन और सामूहिक गौरव का माध्यम है।
बेलगहना में क्रिकेट के साथ-साथ बैडमिंटन और कैरम को लोकप्रिय बनाने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उस समय श्री ओंकार वर्मा और महेश अग्रवाल भी उनके साथ बैडमिंटन के अच्छे खिलाड़ी थे। इन खिलाड़ियों की सक्रियता ने बेलगहना की खेल संस्कृति को एक नई पहचान दी।
काफी समय बाद, जब बैडमिंटन प्रतियोगिताओं का दौर लगभग थम-सा गया था, तब गोरेलाल जी के विशेष आग्रह पर मुझे एक विशाल बैडमिंटन प्रतियोगिता आयोजित करने का अवसर मिला। उन्होंने बड़े आत्मीय भाव से कहा—
“आप प्रतियोगिता कराइए, मेरा पूरा सहयोग रहेगा।”
और उन्होंने अपने शब्दों को पूरी निष्ठा के साथ निभाया। अंपायरिंग से लेकर मैदान की व्यवस्था, खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन और आयोजन की छोटी-बड़ी जिम्मेदारियों तक, हर कार्य में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। एकल और युगल वर्ग को मिलाकर लगभग 138 खिलाड़ियों ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया। लगभग एक माह तक चली इस प्रतियोगिता में गोरेलाल जी प्रतिदिन सबसे पहले पहुंचते और सबसे अंत में लौटते थे। वे हर खिलाड़ी के खेल को ध्यान से देखते और पूरे उत्साह के साथ आयोजन को सफल बनाने में जुटे रहते।
उनकी उपस्थिति मात्र से प्रतियोगिता में एक अलग ऊर्जा का संचार हो जाता था। वे केवल आयोजन का हिस्सा नहीं थे, बल्कि पूरे वातावरण की आत्मा थे। खेल के प्रति उनका समर्पण देखकर युवा खिलाड़ी भी प्रेरित होते थे।
इसी तरह से एक कारण प्रतियोगिता से जुड़ी एक घटना आज भी स्मृतियों में ताजा है। उस समय कैरम का खेल अपने चरम पर था और गोरेलाल रजक जी बेलगहना के सर्वश्रेष्ठ कैरम खिलाड़ियों में गिने जाते थे। दूसरी ओर युवा खिलाड़ी चंद्रप्रकाश जायसवाल तेजी से अपनी पहचान बना रहे थे।
प्रतियोगिता के दौरान पहले एक रोमांचक मुकाबला गोरेलाल के पुत्र रवि राज रजक और चंद्रप्रकाश जायसवाल के बीच हुआ, जिसमें चंद्रप्रकाश विजयी रहे। इसके बाद फाइनल में आमने-सामने थे — अनुभवी खिलाड़ी गोरेलाल रजक और उभरते हुए युवा खिलाड़ी चंद्रप्रकाश जायसवाल।
यह मुकाबला केवल एक खेल नहीं था, बल्कि दो पीढ़ियों के बीच प्रतिभा और अनुभव का संगम था। पूरे क्षेत्र के लोग इस ऐतिहासिक मैच को देखने के लिए एकत्रित हुए। दर्शकों में उत्साह चरम पर था, क्योंकि दोनों खिलाड़ी एक-दूसरे के प्रति सम्मान रखते थे और लंबे समय तक साथ खेल चुके थे।
शानदार और रोमांचक मुकाबले के बाद चंद्रप्रकाश जायसवाल विजेता बने और गोरेलाल रजक जी उपविजेता रहे।
मैच समाप्त होने पर गोरेलाल जी के पुत्र ने कुछ निराश होकर कहा
“क्या पापा, आप हार गए?”
तब गोरेलाल जी ने मुस्कुराते हुए जो उत्तर दिया, वह केवल खेल नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन था—
“एक दिन हर खिलाड़ी को किसी युवा खिलाड़ी से हारना पड़ता है। यही उसकी सबसे बड़ी जीत होती है कि उससे अगली पीढ़ी उससे आगे निकल सके।”
अपने पुत्र को दी गई यह सीख उनके विशाल व्यक्तित्व और खेल भावना का सर्वोत्तम उदाहरण थी। उन्होंने सिखाया कि सच्चा खिलाड़ी केवल जीतना नहीं जानता, बल्कि नई प्रतिभाओं को आगे बढ़ते हुए देखकर प्रसन्न होना भी जानता है।
आज गोरेलाल रजक जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन बेलगहना के पुराने खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों की स्मृतियों में उनका व्यक्तित्व आज भी जीवंत है। जब भी गांव के खेल इतिहास की चर्चा होती है, उनका नाम सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि खेल केवल मैदान में नहीं खेले जाते, बल्कि सेवा, सहयोग, अनुशासन, त्याग और प्रेम से भी जीवित रखे जाते हैं।
बेलगहना की खेल परंपरा में गोरेलाल रजक जी का योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। वे उन विरले व्यक्तित्वों में थे जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के पूरे गांव की खेल संस्कृति को सींचा और अनेक खिलाड़ियों के जीवन में प्रेरणा का दीप प्रज्वलित किया।

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