
*गरियाबंद*:- जिले में राजिम–छुरा सड़क चौड़ीकरण निर्माण कार्य के दौरान सड़क किनारे लगे सैकड़ों पुराने और विशालकाय वृक्षों को जेसीबी एवं चैन माउंटेन मशीन से उखाड़कर फेंके जाने का मामला अब गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
ठेकेदार द्वारा सक्षम अधिकारियों के आदेश और आवश्यक अनुमति के बिना ही पेड़ों को मशीनों से उखाड़ दिया गया। इनमें कई पुराने और कीमती लकड़ियों वाले वृक्ष भी शामिल हैं। हैरानी की बात यह है कि मामला सामने आने के बावजूद अब तक न तो जिम्मेदारों की भूमिका की जांच सार्वजनिक हुई है और न ही संबंधित ठेकेदार के खिलाफ किसी ठोस कार्रवाई की जानकारी सामने आई है।
सड़क विकास और चौड़ीकरण के नाम पर क्या पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की खुली छूट दी जा सकती है? यदि पेड़ों को हटाने के लिए नियमानुसार अनुमति लेना जरूरी है, तो क्या इस मामले में अनुमति ली गई थी?
यदि अनुमति नहीं ली गई, तो संबंधित ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब वन विभाग और जिला प्रशासन को देना चाहिए।
एक तरफ पौधरोपण की अपील, दूसरी तरफ पुराने वृक्षों की कटाई पर चुप्पी!
राजिम विधायक रोहित साहू द्वारा अपने जन्मदिन सहित विभिन्न अवसरों पर ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत पौधरोपण कर लोगों को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित किया जाता है। यह निश्चित रूप से सराहनीय पहल है,
लेकिन दूसरी तरफ उनके विधानसभा क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण के नाम पर पुराने और विशालकाय पेड़ों को मशीनों से उखाड़े जाने के आरोप सामने आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि पौधे लगाने के साथ-साथ वर्षों से खड़े पुराने वृक्षों को बचाने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
क्या विधायक रोहित साहू इस मामले का संज्ञान लेकर मौके का निरीक्षण करेंगे? क्या संबंधित विभाग से पेड़ों को हटाने की अनुमति,
आदेश और कार्रवाई से जुड़े दस्तावेजों की जानकारी मांगेंगे? क्या जिम्मेदार ठेकेदार के खिलाफ जांच और कार्रवाई सुनिश्चित कराने के लिए पहल करेंगे? फिलहाल इन सवालों पर क्षेत्रवासियों की नजरें टिकी हुई हैं।
वन विभाग और जिला प्रशासन की भूमिका पर सवाल
स्थानीय स्तर पर यह मांग उठ रही है कि राजिम–छुरा मार्ग पर उखाड़े गए पेड़ों की वास्तविक संख्या का आकलन किया जाए। यह भी जांच हो कि किन अधिकारियों की अनुमति से पेड़ों को हटाया गया और क्या निर्धारित नियमों का पालन किया गया। यदि बिना अनुमति वृक्षों को उखाड़ा गया है, तो ठेकेदार के साथ-साथ इस कार्य में लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
पर्यावरण संरक्षण केवल पौधरोपण कार्यक्रम आयोजित करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। वर्षों में तैयार होने वाले विशाल वृक्षों को बचाना भी उतना ही जरूरी है।
अब देखना होगा कि वन विभाग और जिला प्रशासन इस मामले में कब तक जांच शुरू करते हैं और क्या वास्तव में जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।

भाजपा सरकार में जंगलों की कटाई पर नियम-कानून बेअसर? ठेकेदार पर मेहरबानी या विभागीय लापरवाही? विधायक रोहित साहू के ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान पर भी उठे सवाल">






