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वनांचल की वादियों में नेटवर्क गायब, फिर भी ऑनलाइन काम का दबाव – आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की पीड़ा छलकी “न नेटवर्क, न संसाधन – फिर भी जिम्मेदारी का बोझ भारी”

रतनपुर से रवि ठाकुर की रिपोर्ट
रतनपुर से रवि ठाकुर की रिपोर्ट

बिलासपुर/अचानकमार :—
वनांचल की गहराइयों में बसे ग्रामीण क्षेत्र की आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की आवाज़ आज भी सिस्टम की चुप्पी में दब रही है। लोरमी विकासखंड अंतर्गत अचानकमार सेक्टर की अनेक आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि वे अत्यंत कठिन परिस्थितियों में काम कर रही हैं, लेकिन महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों द्वारा उन्हें ऐसे कार्यों के लिए मजबूर किया जा रहा है, जो उनकी ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर हैं।

इन कार्यकर्ताओं का कहना है कि क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क की सुविधा न के बराबर है, इसके बावजूद विभागीय स्तर पर ऑनलाइन कार्यों का निरंतर दबाव बनाया जा रहा है। सुपरवाइज़र और वरिष्ठ अधिकारी बार-बार ऑनलाइन कार्य अपलोड करने, ई-केवाईसी कराने, आधार लिंकिंग एवं हितग्राही सत्यापन जैसे तकनीकी कामों के लिए कह रहे हैं। इतना ही नहीं, कई बार मानदेय काटने की चेतावनी दी जाती है और कुछ मामलों में आंशिक मानदेय कटौती भी की जा चुकी है।

अपने पैसे से कराओ काम” – ये कैसा अन्याय?

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने बताया कि हितग्राहियों के आधार में मोबाइल नंबर लिंक नहीं हैं, जिससे ई-केवाईसी जैसी प्रक्रिया संभव नहीं हो पा रही। इसके बावजूद अधिकारी इन कार्यों को पूरा करने का दबाव बनाकर उन्हें अपने खर्चे से यह कार्य कराने के लिए बाध्य कर रहे हैं। उन्हें न कोई टेक्निकल ट्रेनिंग दी गई, न ही नेटवर्क की सुविधा, फिर भी उनसे ऐसी उम्मीदें की जा रही हैं जो व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हैं।

ऑफलाइन काम ही हमारा समाधान” – मांग की जोरदार आवाज

थक-हारकर इन महिलाओं ने अब जिला प्रशासन से गुहार लगाई है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे किसी कार्य से पीछे नहीं हट रही हैं, लेकिन जिस परिस्थिति में वे कार्य कर रही हैं, उस पर ध्यान देना जरूरी है। उन्होंने मांग की है कि जब तक उनके क्षेत्रों में नेटवर्क और डिजिटल संसाधन पूरी तरह उपलब्ध नहीं होते, तब तक ऑनलाइन की बजाय पुराने तरीके से ऑफलाइन कार्यों को ही मान्यता दी जाए।

हम सिर्फ कर्मचारी नहीं, गाँव की आशा हैं”

इन आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने भावुक होकर कहा, “हम गाँव की हर गर्भवती, हर बच्चा, हर माँ की सेवा करती हैं, लेकिन जब सिस्टम हमारी ही आवाज़ को नहीं सुनता, तो हम किससे उम्मीद करें?”

अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग इन जमीनी हकीकतों को समझकर इन नायिकाओं की आवाज़ को कब तक सुनेगा और उन्हें इस अनचाही डिजिटल बंदिश से राहत दिलाएगा।

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