
*गरियाबंद*:- छत्तीसगढ़ की माटी केवल प्राकृतिक सौंदर्य से ही समृद्ध नहीं है, बल्कि यह लोकसंस्कृति, जनश्रुतियों और ऐतिहासिक स्मृतियों का भी अमूल्य भंडार है। फुलझर अंचल के घने जंगल, रहस्यमयी गुफाएँ, प्राचीन जलकुंड और लोकआस्थाओं से जुड़े स्थल आज भी बीते युगों की कहानियाँ अपने भीतर संजोए हुए हैं। इन्हीं सांस्कृतिक धरोहरों को खोजने, संरक्षित करने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं लोकसंस्कृति संरक्षक गौकरण मानिकपुरी एवं लोक इतिहास शोधकर्ता राजकुमार यादव।
अंतर्राष्ट्रीय अभिलेखागार सप्ताह के अवसर पर रायपुर में आयोजित कार्यक्रम में दोनों की सहभागिता केवल एक औपचारिक उपस्थिति नहीं थी, बल्कि यह उस लोक चेतना का प्रतिनिधित्व था जो वर्षों से ग्रामीण स्मृतियों, लोकगीतों और जनविश्वासों में जीवित है। कार्यक्रम में ऐतिहासिक अभिलेखों और संरक्षण की प्रक्रियाओं का अध्ययन करते हुए उन्होंने इस विचार को प्रमुखता दी कि इतिहास केवल दस्तावेजों और शिलालेखों में नहीं, बल्कि लोकजीवन की स्मृतियों में भी सुरक्षित रहता है।
फुलझर अंचल के सांस्कृतिक पुरोधा गौकरण मानिकपुरी ने अपना जीवन लोकगीत, जसगीत, ददरिया, करमा और जनश्रुतियों के संरक्षण को समर्पित किया है। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर बुजुर्गों से लोककथाएँ संकलित कीं और विलुप्त होती सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनका मानना है कि लोकसंस्कृति किसी भी समाज की आत्मा होती है और इसके बिना समाज अपनी पहचान खो देता है।
वहीं राजकुमार यादव ने वर्षों तक धसकुड जंगल, जाम कुंड, जामवंत गुफा, अग्निकुंड, जाम नाला और घटारानी क्षेत्र का भ्रमण कर स्थानीय जनश्रुतियों और ऐतिहासिक तथ्यों का संग्रह किया है। उन्होंने इन स्थलों से जुड़ी लोकमान्यताओं को दस्तावेजी स्वरूप देने का प्रयास किया है ताकि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत भविष्य के लिए सुरक्षित रह सके।
धसकुड क्षेत्र, जिसे ब्रिटिशकालीन अभिलेखों में “दसकुड” कहा गया है, आज भी रहस्य और आस्था का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यहाँ नौ जलकुंड और एक अग्निकुंड स्थित हैं। वहीं जाम कुंड और जामवंत गुफा त्रेता युग से जुड़ी लोककथाओं के कारण लोगों की श्रद्धा के केंद्र हैं। इसी प्रकार घटारानी जलप्रपात और माँ घटारानी मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक आस्था का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हैं।
गौकरण मानिकपुरी और राजकुमार यादव का मानना है कि यदि इन स्थलों का संरक्षण और व्यवस्थित प्रचार-प्रसार किया जाए तो फुलझर अंचल सांस्कृतिक, धार्मिक एवं प्राकृतिक पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे और क्षेत्रीय पहचान को नई मजबूती प्राप्त होगी।
आज जब आधुनिकता के प्रभाव में लोकपरंपराएँ धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, तब ऐसे समर्पित लोग हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों के प्रहरी बनकर खड़े हैं। उनका यह प्रयास केवल अतीत को सहेजने का नहीं, बल्कि भविष्य को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक सार्थक अभियान है।

फुलझर के जंगलों से इतिहास की खोज तक, लोकसंस्कृति और जनश्रुतियों को सहेजने की अनूठी मुहिम">








