
पोला पर सजे बैल, किसान ने तिलक लगाकर उतारी आरती; भरपेट भोजन कर कहा—तू है तो खेत है, खेत है तो अन्न है
मशीनों के दौर में भी नहीं भूले सदियों पुराने कृषि साथी को, गांव-गांव दिखा किसान और बैल के बीच अपनत्व का रिश्ता
बेलगहना।
वह बोल नहीं सकता, लेकिन किसान उसके साथ बिताए हर मौसम की कहानी समझता है। वह अपनी मेहनत का हिसाब नहीं मांगता, लेकिन किसान जानता है कि उसके साथ खेत में बहाया गया हर पसीना अन्न के एक-एक दाने में शामिल है। कभी तपती दोपहर में, कभी बारिश में और कभी ठंडी सुबह में किसान के साथ खेत तक पहुंचने वाला यही बैल पोला के दिन किसान के लिए सबसे खास हो जाता है।
पोला पर्व पर गांवों में कुछ ऐसा ही भावुक दृश्य देखने को मिला। खेतों में किसान के साथ सालभर मेहनत करने वाले बैलों को स्नान कराया गया। उन्हें सजाया-संवारा गया। सींगों पर रंग चढ़ा, गले में घंटियां सजीं और माथे पर तिलक लगा। इसके बाद किसान परिवारों ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर उनकी आरती उतारी और भरपेट भोजन कराया।
यह सिर्फ पूजा नहीं थी… यह उस साथी के प्रति कृतज्ञता थी, जिसने किसान की जिंदगी में कभी अपना हिस्सा नहीं मांगा।
बैल नहीं, किसान का खेत-साथी
“तूने हल खींचा, हमने अन्न उगाया… तेरे श्रम से ही घरों के चूल्हे जले”
किसान और बैल का रिश्ता सदियों पुराना है। पारंपरिक खेती में बैल किसान का सबसे भरोसेमंद साथी रहा है। हल खींचने से लेकर खेत तैयार करने तक बैलों ने किसान के साथ कदम मिलाकर काम किया है।
पोला पर्व इसी रिश्ते को सम्मान देने का अवसर है। किसान अपने बैल को केवल पशु के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसे परिवार के सदस्य और खेती के साथी के रूप में सम्मान देता है।
आज भले ही खेतों में आधुनिक मशीनों और ट्रैक्टरों का उपयोग बढ़ गया हो, लेकिन ग्रामीण अंचलों में पारंपरिक खेती से जुड़े परिवारों के लिए बैलों की उपयोगिता और भावनात्मक महत्व आज भी कम नहीं हुआ है।
“बिना बैल के पारंपरिक खेती की कल्पना अधूरी”
जनपद सदस्य नेहा सचिन साहू ने पोला पर्व पर क्षेत्रवासियों को दी शुभकामनाएं
जनपद सदस्य नेहा सचिन साहू एवं प्रतिनिधि सचिन साहू ने पोला पर्व की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि किसान और बैल का रिश्ता केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी ग्रामीण संस्कृति और परंपरा का अभिन्न हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि बिना बैलों के पारंपरिक खेती करना संभव नहीं है। किसान के साथ खेत में मेहनत करने वाले इन कृषि साथियों की पूजा करना हमारे लिए सौभाग्य की बात है।
उन्होंने कहा कि जिन बैलों के श्रम के दम पर किसान खेत तैयार करता है और अन्न पैदा करता है, उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना हमारी संस्कृति की खूबसूरती है। पोला पर्व हमें प्रकृति, पशुधन, किसान और खेती के बीच के गहरे रिश्ते को समझने का संदेश देता है।
नेहा सचिन साहू ने समस्त क्षेत्रवासियों एवं देशवासियों को पोला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए किसान परिवारों के सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की।
पोला का संदेश
अन्न की कीमत समझनी है तो किसान का पसीना और बैल का श्रम देखिए
हमारी थाली में पहुंचने वाला हर दाना किसी न किसी किसान की मेहनत की कहानी कहता है। उस मेहनत में केवल किसान के हाथ ही नहीं, बल्कि वर्षों तक उसके साथ खेत में चलने वाले पशुधन का भी योगदान रहा है।
पोला पर्व हमें याद दिलाता है कि अन्न का सम्मान तभी पूरा होगा, जब अन्नदाता और उसके कृषि साथियों का सम्मान होगा।
बदलते दौर में भी नहीं बदला भाव
खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। खेतों में ट्रैक्टर और आधुनिक मशीनें पहुंच गई हैं। काम आसान हुआ है, समय बचा है, लेकिन गांवों में पोला की परंपरा आज भी उसी आत्मीयता के साथ निभाई जा रही है।
किसान अपने बैलों को नहलाता है, साफ करता है, सजाता है और फिर पूजा करता है। घर की महिलाएं विशेष पकवान बनाती हैं। बच्चे भी उत्साह के साथ बैलों की सजावट में शामिल होते हैं।
यह दृश्य केवल एक त्योहार का दृश्य नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने वाली जीवंत परंपरा है।
जनपद सदस्य सचिन नेहा साहू ने कहा
किसान की जुबान से बैल के लिए एक भाव
“तूने कभी अपनी मेहनत का हिसाब नहीं मांगा… आज तुझे प्रणाम करने का दिन है”
पोला का सबसे भावुक पक्ष यही है कि किसान अपने उस साथी के सामने सिर झुकाता है, जो पूरे साल बिना किसी शिकायत के उसके साथ मेहनत करता है।
जिस बैल के कदम खेत की मिट्टी में पड़े, उसी मिट्टी से अन्न निकला। उसी अन्न से परिवार का पेट भरा और उसी अन्न से समाज का जीवन चला।
इसलिए पोला में बैल की पूजा वास्तव में किसान के श्रम, पशुधन के योगदान और धरती मां के प्रति सम्मान की पूजा है।
माथे पर तिलक, सींगों पर रंग और गले में घंटियां… गांवों में दिखा परंपरा का रंग
पोला के अवसर पर सजे-धजे बैलों की कतारें गांव की गलियों और आंगनों में दिखाई दीं। कहीं बैलों के सींगों पर आकर्षक रंग चढ़ाया गया तो कहीं उन्हें फूलों और पारंपरिक साज-सज्जा से सजाया गया। पूजा के बाद उन्हें विशेष भोजन कराया गया।
बुजुर्गों ने बच्चों को पोला की परंपरा और खेती में बैलों के योगदान के बारे में बताया। इस दौरान गांवों में त्योहार का उल्लास तो था ही, साथ ही अपनी कृषि संस्कृति के प्रति गर्व का भाव भी दिखाई दिया।
“बैल के माथे पर लगा तिलक सिर्फ पूजा नहीं… अन्नदाता ने अपने उस साथी को धन्यवाद कहा, जिसके श्रम से खेतों में हरियाली और घरों में अन्न आया।”

जिसके दम पर खेत लहलहाए, आज उसी बैल के आगे झुक गया अन्नदाता का सिर जनपद सदस्य सचिन नेहा साहू ने कहा">








