
खूंटाघाट में सड़ा सिस्टम: ठेकेदार की मनमानी पर प्रशासन मौन, जलाशय की आत्मा को लील रहा अवैध निर्माण
रतनपुर/खूंटाघाट/कर्रा:—-
एक समय था जब खारंग जलाशय को छत्तीसगढ़ का अगला बड़ा पर्यटन केंद्र बनाने का सपना देखा गया था — लेकिन आज वही जलाशय एक ठेकेदार की हवस, अधिकारियों की लाचारी, और सिस्टम की बेशर्मी का उदाहरण बन गया है। वाटर स्पोर्ट्स के नाम पर दिया गया अधिकार, अब एक भू-माफिया की तरह इस्तेमाल हो रहा है —
और प्रशासन, सिर्फ ‘जानकारी नहीं है’ कहकर पल्ला झाड़ रहा है।वाटर स्पोर्ट्स सुविधा के साथ पर्यटकों की सहूलियत के लिए पानी के समीप अस्थायी कैंटीन की अनुमति दी गई थी, लेकिन ठेकेदार ने उसे ठेंगा दिखाते हुए पार्किंग एरिया पर ही स्थायी निर्माण खड़ा कर लिया।
न कोई स्वीकृति, न कोई प्रक्रिया — और न कोई डर।
आज वह कैंटीन न सिर्फ चल रही है, बल्कि सरकारी ज़मीन पर स्थायी कब्जे की शुरुआत का संकेत बन गई है।
मुझे कुछ जानकारी नहीं’: अधिकारी बोले, ज़मीन गई तो गई..
जब इस अतिक्रमण पर एसडीओपी श्रीवास्तव से सवाल किया गया तो उनका जवाब प्रशासनिक शर्म का सबसे काला अध्याय बन गया। उन्होंने दो टूक कहा:
इस विषय में मुझे कोई जानकारी नहीं है, आप ऊपर बात करिए।
ऐसा जवाब एक आम व्यक्ति दे तो समझ आता है, लेकिन जब एक जिम्मेदार अधिकारी यह कहे — तो सवाल उठता है, क्या सच में अज्ञानता है या जानबूझकर चुप्पी?
मुख्य अभियंता बोले: “मैं तो नया आया हूँ” — क्या ये बहाना काफी है?
वहीं विभाग के मुख्य अभियंता मधु चंद्रा ने भी खुद को इस घोटाले से अलग रखने की कोशिश की। उनका बयान था:
मैं हाल ही में आया हूँ, निर्माण मेरे पहले का है। जांच के बाद ही कुछ कह पाऊँगा।
क्या यह बयान काफी है जब सार्वजनिक ज़मीन पर कब्जा हो चुका हो? क्या जांच तब होगी जब निर्माण पूरी तरह कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में तब्दील हो जाएगा?
पहले भी तोड़ी मर्यादा, अब कर रहा कब्जा — ठेकेदार का इतिहास संदिग्ध
यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले जलाशय के मुख्य द्वार के सामने भी ठेकेदार ने अवैध कैंटीन का निर्माण कर लिया था। उस पर नोटिस भी जारी हुए, लेकिन कार्रवाई शून्य।

आज भी वह अवैध कैंटीन धड़ल्ले से संचालित हो रही है — और सिस्टम उसके सामने घुटनों के बल बैठा है।
खारंग की आत्मा रो रही है — जिम्मेदारों के मौन से
यह खबर सिर्फ एक अवैध निर्माण की नहीं है।
यह खबर है — एक सपने के मरने की।
यह खबर है — सरकारी जमीन की लूट की।
यह खबर है — जनता की उम्मीदों के चीरहरण की।
खारंग जलाशय, जो युवाओं के लिए साहसिक खेलों का केंद्र बन सकता था, अब धीरे-धीरे ठेकेदार की दुकान में बदलता जा रहा है। पानी की लहरों के बीच अब रोमांच नहीं, लापरवाही की सड़ांध बह रही है।
जनता का सवाल: क्या ठेकेदार प्रशासन से बड़ा है?
अगर एक सामान्य व्यक्ति बिना अनुमति कुछ बनाए तो प्रशासन तोड़फोड़ करता है, लेकिन ठेकेदार पर चुप्पी क्यों?
अधिकारियों को जानकारी नहीं — क्या ये अज्ञानता है या सोची-समझी मिलीभगत?
क्या वाटर स्पोर्ट्स की आड़ में खारंग जलाशय को ‘बिकने’ दिया जा रहा है?
अब वक्त आ गया है — जनता बोले, प्रशासन जागे
इस देश का सिस्टम अगर ठेकेदारों और रसूखदारों के आगे नतमस्तक है, तो आम जनता किससे उम्मीद करे?
खारंग जलाशय की ज़मीन अभी भी इंतज़ार कर रही है —
इंसाफ का, कार्रवाई का, और उस सपने के फिर से जी उठने का…








