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छत के साए में मौत की आहट: कोटा ब्लॉक के छात्रावास में अनदेखी बन सकती है अगली त्रासदी की वजह

रतनपुर से रवि ठाकुर की रिपोर्ट
रतनपुर से रवि ठाकुर की रिपोर्ट

छत टपक रही है, डर बरस रहा है: कोटा ब्लॉक के छात्रावास में पल रही मौत की आशंका, कब जागेगा सिस्टम?”

रतनपुर, जिला बिलासपुर:—-
एक तरफ़ सरकार बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की बात करती है, शिक्षा को अधिकार बताती है, और विशेष रूप से अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के बच्चों के लिए छात्रावास खोलकर उन्हें बेहतर अवसर देने का दावा करती है। मगर दूसरी तरफ़ ज़मीनी हकीकत इन दावों को शर्मसार करती नजर आती है।कोटा विकासखंड के अंतर्गत रतनपुर स्थित प्री-मैट्रिक अनुसूचित जाति बालक छात्रावास की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि वहां पढ़ने और रहने वाले करीब 50 बच्चे हर दिन जान का जोखिम उठाकर उसी इमारत के नीचे जीने को मजबूर हैं।

छत से गिर रहा प्लास्टर, कब गिरेगी ज़िंदगी?

छात्रावास की छतें कई जगह से झड़ चुकी हैं। प्लास्टर रोज़ाना झड़ रहा है, दीवारें दरक चुकी हैं, और कमरे हर पल हादसे का इंतजार कर रहे हैं। बच्चों को डर है कि सोते वक्त कहीं सिर पर मलबा न गिर जाए, खेलते वक्त छत की कोई सिल न टूट पड़े। पढ़ाई से पहले अब उनके मन में यह सवाल आता है— “आज भी ज़िंदा लौटेंगे क्या?”

झालावाड़ जैसी दुर्घटना दोहराने की तैयारी?

कुछ ही दिन पहले राजस्थान के झालावाड़ में स्कूल की छत का प्लास्टर गिरने से 7 मासूम बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई थी। इस भयावह घटना ने पूरे देश को दहला दिया था। लेकिन क्या छत्तीसगढ़ का प्रशासन उस त्रासदी से कोई सीख लेने को तैयार है?रतनपुर छात्रावास की हालत देखकर लगता है जैसे यहां भी बस एक मौत की देर है—फिर सिस्टम दौड़ेगा, अफसर दौरे करेंगे, कंधों पर चादरें डालकर संवेदना जताई जाएगी, मगर तब तक देर हो चुकी होगी।

लापरवाही या अपराध?

स्थानीय लोगों और अभिभावकों ने कई बार अधिकारियों को इस संबंध में अवगत कराया है, लेकिन आज तक न तो किसी ने निरीक्षण किया, न ही मरम्मत की कोई प्रक्रिया शुरू की गई। आदिवासी एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग के अधीन संचालित इस छात्रावास में बच्चों की जान को यूँ जोखिम में डालना क्या लापरवाही नहीं, बल्कि एक अपराध नहीं है?

बच्चों की नींद डर के साए में

छात्रावास में रहने वाले बच्चों ने बताया कि बरसात के दिनों में पानी टपकता है, दीवारें सीलन से गल चुकी हैं और प्लास्टर गिरने की आवाजें अब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी हैं। न दिन चैन है, न रात की नींद। जब घर से दूर आए बच्चे सरकारी भरोसे पढ़ाई करने आए हैं, तो क्या उनकी ज़िंदगी इतनी सस्ती है?

अब नहीं रुकी अनदेखी, तो लहूलुहान होगी संवेदनाएं

यह खबर एक चेतावनी नहीं, बल्कि चीख है उन बच्चों की जो हर दिन इस खतरे के बीच ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं। जिला प्रशासन, कोटा विकासखंड के अधिकारी, आदिवासी विकास विभाग— सभी को अब जवाब देना होगा।
क्योंकि अगर आज कदम नहीं उठाए गए, तो कल किसी बच्चे की मौत की खबर पर हम सबका सिर झुका होगा।

प्रपोजल भेजा गया है

मेंटेनेंस व अनेक कार्यो का प्रपोजल बना कर भेजा गयाहै ,स्वीकृत होकर फ़ंड आते ही तत्काल कार्य कराया जाएगा।

पी सी लहरे
सहायक आयुक्त
बिलासपुर

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