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लघुकथा ‘आम का बँटवारा’ ने बयां किए रिश्तों के मायने

“संभागीय जिला ब्यूरो रवि राज रजक की रिपोर्ट”
“संभागीय जिला ब्यूरो रवि राज रजक की रिपोर्ट”

बेलगहना:—एक छोटे से गाँव में तीन भाइयों का संयुक्त परिवार रहता था। गाँव के लोग उस परिवार को आदर्श मानते थे। तीनों भाइयों में इतना प्रेम था कि लोग कहा करते थे—
“यदि भाईचारे का कोई जीवंत उदाहरण देखना हो, तो इनके घर जाकर देखो।”
तीनों भाई मानो एक ही हल्दी की तीन गाँठें थे।
रामदीन सबसे बड़े थे। मोहन और राकेश दोनों छोटे भाई थे। दोनों के बीच उम्र में लगभग ग्यारह वर्ष का अंतर था।
सबसे बड़े भाई रामदीन का स्वभाव अत्यंत शांत, त्यागी और जिम्मेदार था। पिता के देहांत के बाद घर की सारी जिम्मेदारियाँ उनके कंधों पर आ गई थीं। उम्र कम थी, पर परिस्थितियों ने उन्हें समय से पहले ही परिपक्व बना दिया था। वे स्वयं अधिक पढ़-लिख नहीं पाए, क्योंकि उन्हें खेत, घर और परिवार सब संभालना पड़ा।
लेकिन उन्होंने अपने दोनों छोटे भाइयों की पढ़ाई में कभी कोई कमी नहीं आने दी। वे खेतों में दिन-रात मेहनत करते, ताकि छोटे भाई अच्छे विद्यालयों में पढ़ सकें। बड़े भाई की पत्नी भी उतनी ही त्यागमयी थीं। उन्होंने देवरों को अपने बच्चों की तरह पाला। जब दोनों भाई पढ़ने शहर जाते, तो भाभी चुपके से उनकी जेब में कुछ रुपये रख देतीं और कहतीं—

“बेटा, मन लगाकर पढ़ना… घर की चिंता मत करना।”

समय धीरे-धीरे बीतता गया। दोनों छोटे भाई पढ़ाई में अत्यंत होशियार निकले। कठिन परिश्रम के बल पर एक दिन दोनों ने आईएएस की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। पूरे गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई। मिठाइयाँ बाँटी गईं। बड़े भाई की आँखों में गर्व के आँसू थे। उन्हें लग रहा था मानो उनकी वर्षों की तपस्या सफल हो गई हो।
दोनों छोटे भाई बड़े अधिकारी बन गए। शहरों में उनकी नियुक्ति हो गई। परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर गई। बड़ा भाई अब भी गाँव में रहकर खेती-बाड़ी संभालता रहा।
कुछ वर्षों बाद बड़े भाई ने धूमधाम से दोनों भाइयों का विवाह कराया। घर में नई बहुएँ आईं। धीरे-धीेरे परिवार और बड़ा होता गया। छोटे भाइयों के घर बच्चों की किलकारियाँ गूँजने लगीं।
इसी बीच वर्षों की प्रतीक्षा के बाद ईश्वर ने रामदीन की झोली भी भर दी। अधिक उम्र में उन्हें पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई। स्वाभाविक था कि उन्हें अपने पुत्र से विशेष मोह हो गया।
अब घर में बच्चों की चहल-पहल रहती। सभी बच्चे साथ खेलते, साथ खाते और साथ ही बड़े हो रहे थे। गर्मियों की छुट्टियों में जब दोनों छोटे भाई शहर से गाँव आते, तो पूरा घर मानो उत्सव में बदल जाता। रात में सब छत पर बैठकर बातें करते, बच्चे आँगन में खेलते और भाभी पूरे परिवार के लिए प्रेम से भोजन बनातीं।
गाँव वाले आज भी उस परिवार की मिसाल देते थे। लोग कहते—

“धन तो बहुतों के पास होता है, पर इतना प्रेम और अपनापन हर किसी को नहीं मिलता।”

लेकिन कहते हैं न—
कभी-कभी बड़ी दरारें बहुत छोटी बातों से शुरू होती हैं।
एक दिन सुबह बड़े भाई रोज की तरह लोटा लेकर गाँव के बाहर दिशा-मैदान गए। लौटते समय रास्ते में उन्हें एक पका हुआ पीला आम पड़ा मिला। उन्होंने उसे उठाकर लोटे में रख लिया और घर ले आए।
घर पहुँचते ही बच्चों की नजर उस आम पर पड़ गई। सभी बच्चे उसे पाने की जिद करने लगे।
कोई कहता— “मुझे दो!”
तो कोई कहता— “मैं खाऊँगा!”
बड़े भाई मुस्कुराए। उन्होंने आम को धोया, उसके दो टुकड़े किए और बिना कुछ सोचे वह आम अपने बेटे को दे दिया।
उस समय दोनों छोटे भाई वहीं बैठे थे। उनमें से एक छोटे भाई ने यह दृश्य देखा। वह चुप रहा, लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान कहीं खो गई।
पूरा दिन बीत गया।
शाम को जब सब लोग आँगन में बैठे थे, तब छोटे भाई ने अचानक शांत स्वर में कहा—
“भैया, अब हमें घर और संपत्ति का बँटवारा कर लेना चाहिए।”
यह सुनते ही जैसे पूरा घर थम गया।
बड़े भाई स्तब्ध रह गए। भाभी की आँखों में आँसू भर आए। दूसरे भाई को भी विश्वास नहीं हुआ।
बड़े भाई काँपती आवाज में बोले—
“आखिर ऐसी क्या बात हो गई, जो तुम बँटवारा माँग रहे हो?”
भाभी रोते हुए बोलीं—
“देवर जी, यदि हमसे कोई गलती हुई है तो बता दीजिए।”
धीरे-धीरे यह बात पूरे गाँव में फैल गई। अगले दिन पंचायत बैठी। गाँव के बुजुर्ग, रिश्तेदार और आसपास के लोग सब इकट्ठा हो गए। सभी हैरान थे कि इतना प्रेम करने वाला परिवार आखिर क्यों टूटने की कगार पर आ गया।
पंचों ने छोटे भाई से पूछा—
“तुम इतने बड़े अधिकारी हो। तुम्हारे पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं। फिर आखिर बँटवारे की जरूरत क्यों पड़ गई?”
छोटे भाई ने अत्यंत शांत लेकिन गहरी आवाज में उत्तर दिया—
“बात आम की नहीं है… बात न्याय की है।
भैया इस परिवार के मुखिया हैं। यदि वे एक छोटे से आम का न्यायपूर्ण बँटवारा नहीं कर सके, तो कल इतनी बड़ी जमीन-जायदाद का बँटवारा कैसे निष्पक्षता से करेंगे?
आज मैंने पहली बार महसूस किया कि उनके मन में अपना और पराया आ गया है। और जिस दिन परिवार में अपना-पराया शुरू हो जाए, उसी दिन से टूटन शुरू हो जाती है।”
उसकी बात सुनकर पूरा गाँव मौन हो गया।
बड़े भाई की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने अनजाने में ही सही, लेकिन पक्षपात कर दिया था। एक छोटा-सा आम उस दिन पूरे परिवार के लिए आईना बन गया।
पंचायत में भी उन दोनों भाइयों के उच्च अधिकारी होने का ऐसा दबदबा था कि पंचायत का कोई व्यक्ति खुलकर उनके विरुद्ध बोलने का साहस नहीं कर पा रहा था। चारों ओर गहरी चुप्पी छाई हुई थी।
तभी पीछे बैठे लगभग पचहत्तर वर्षीय चंदन चाचा से रहा नहीं गया। वे उस परिवार के सुख-दुख के वर्षों पुराने साक्षी थे। उन्होंने धीरे-धीरे उठते हुए कहा—
“मोहन बाबू, आप बहुत बड़े साहब हैं। हमसे बहुत अधिक पढ़े-लिखे हैं। न जाने कितनों को पीछे छोड़कर इतनी ऊँचाई तक पहुँचे हैं।
मुझ जैसे अनपढ़ का बोलना छोटे मुँह बड़ी बात होगी… फिर भी यदि आज नहीं बोलूँगा तो पाप होगा।”
पूरा पंचायत स्थल शांत हो गया।
चंदन चाचा आगे बोले—
“रामदीन और बड़ी बहू को मैंने जीवन भर बँटवारा करते देखा है।
रामदीन खुद एक रोटी खाते थे और तुम भाइयों की थाली में दो-दो रोटियाँ रखते थे।
जब तुम पढ़ने शहर जाते थे, तब कल्लू सेठ से ब्याज पर उधार लेकर तुम्हें पैसे देते थे। उस समय उन्हें यह चिंता नहीं थी कि कल उनका अपना परिवार क्या खाएगा।
बड़ी बहू ने भी कभी अपना-पराया नहीं किया। उन्होंने तुम दोनों को बेटों की तरह पाला।
उस दिन उन्होंने बँटवारे में कोई पक्षपात नहीं किया था।”
चंदन चाचा की आवाज भर्रा गई।
वे फिर बोले—
“हो सकता है कि आज पुत्र-मोह में आम का बँटवारा गलत हो गया हो…
लेकिन क्या इतने वर्षों का त्याग एक गलती से छोटा हो जाएगा?
क्या सौ दिनों की तपस्या एक मिनट की भूल से हार जाएगी?
जिस परिवार की मिसाल पूरा गाँव देता था, आज वही परिवार एक छोटे से आम के कारण टूटने जा रहा है।
मेरे हिसाब से, बेटा… आज बँटवारे में गलती रामदीन ने नहीं, तुमने की है।”
इतना कहकर चंदन चाचा चुप हो गए।
पूरी पंचायत स्तब्ध थी। चारों ओर गहरा सन्नाटा छा गया।
उसी सन्नाटे के बीच हल्की-सी सिसकी सुनाई दी। मोहन बाबू की आँखें आँसुओं से भर चुकी थीं। तभी भीतर से उनकी पत्नी निकली और रोते हुए बड़े भैया के चरणों में गिर पड़ी।
क्षणभर में दोनों छोटे भाई भी बड़े भाई के पैरों में गिर पड़े।
वे रोते हुए बोले—
“भैया, हमें क्षमा कर दीजिए… हमसे भूल हो गई।”
बड़ा भाई भी फूट-फूटकर रो पड़ा। वह छोटे भाइयों से क्षमा माँगने लगा।
एक बुजुर्ग की सच्ची और निष्पक्ष नसीहत ने उस दिन भारी चुप्पी तोड़ दी। टूटता हुआ घर बच गया। बिखरता हुआ परिवार फिर जुड़ गया।
कहीं एक आम से परिवारों का बँटवारा होता है?
गलतियाँ तो हर परिवार में होती हैं, पर प्रेम और संवाद उन्हें टूटने नहीं देते।
परिवार केवल प्रेम से नहीं, बल्कि न्याय और समानता से भी चलता है। मुखिया का छोटा-सा पक्षपात भी रिश्तों में ऐसी दरार डाल सकता है, जिसे भरना कठिन हो जाता है।
लेकिन उतना ही सत्य यह भी है कि वर्षों के त्याग, प्रेम और समर्पण को एक क्षण की भूल से नहीं तौला जाना चाहिए।
न्याय केवल बड़ी संपत्तियों में नहीं, बल्कि छोटी-छोटी बातों में भी दिखाई देना चाहिए — और परिवार केवल अधिकार से नहीं, बल्कि क्षमा, कृतज्ञता और संवेदना से भी बचते हैं।
— सूर्यकांत बाजपेई, बेलगहना

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