
टेंगनमाड़ा के राजकुमार बुनकर गार्ड पद से सेवानिवृत्त; भावुक विदाई में नम हुईं आंखें, गांव में हुआ भव्य स्वागत
1990 में यातायात सहायक के रूप में शुरू किया था रेल सेवा का सफर, कई महत्वपूर्ण स्टेशनों पर निभाई जिम्मेदारी।
2022 की दुर्घटना के बाद भी नहीं छोड़ा हौसला, पूरी निष्ठा से 60 वर्ष की आयु तक निभाया कर्तव्य।
“रेलवे के नाम एक वृक्ष” अभियान के तहत पौधरोपण कर पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश।
टेंगनमाड़ा।
भारतीय रेलवे में 36 वर्षों तक ईमानदारी, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा के साथ सेवाएं देने वाले टेंगनमाड़ा निवासी राजकुमार बुनकर गार्ड पद से सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त हो गए। उनकी विदाई केवल एक कर्मचारी की सेवानिवृत्ति नहीं, बल्कि रेलवे के एक समर्पित और अनुकरणीय अध्याय के सम्मान का अवसर बन गई। विदाई समारोह में मौजूद अधिकारियों और कर्मचारियों ने उनकी सेवाओं को याद करते हुए उन्हें स्वस्थ, सुखमय और दीर्घ जीवन की शुभकामनाएं दीं।

राजकुमार बुनकर ने वर्ष 1990 में प्रथम यातायात सहायक के रूप में रेलवे सेवा शुरू की थी। बाद में पदोन्नति प्राप्त कर उन्होंने बिजरी, बिलासपुर, खोंगसरा और पेंड्रा जैसे महत्वपूर्ण स्टेशनों पर अपनी जिम्मेदारियां निभाईं। तीन दशक से अधिक लंबे सेवाकाल में उन्होंने समयपालन, सुरक्षा और अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी तथा कभी भी अपने कर्तव्य से समझौता नहीं किया।

वर्ष 2022 में ड्यूटी के दौरान हुई दुर्घटना उनके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा थी, लेकिन उन्होंने अदम्य साहस और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर वापसी की। स्वास्थ्य लाभ के बाद फिर उसी समर्पण के साथ ड्यूटी पर लौटे और 36 वर्षों की गौरवपूर्ण सेवा पूरी कर सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त हुए।
विदाई समारोह में अपने संबोधन के दौरान श्री बुनकर ने युवा कर्मचारियों से कहा कि रेलवे जैसी जिम्मेदार सेवा में धैर्य, सतर्कता और अनुशासन सबसे बड़ी पूंजी है। उन्होंने गार्ड की ब्रेक वैन को हमेशा स्वच्छ रखने, सुरक्षा नियमों का पालन करने और कठिन परिस्थितियों में भी जिम्मेदारी से कार्य करने की सीख दी।
समारोह का सबसे भावुक क्षण तब आया जब उनके पुत्र और पुत्री ने मंच से अपने पिता के संघर्ष, त्याग और ईमानदारी को याद करते हुए भावपूर्ण शब्द कहे। बच्चों की बातें सुनकर राजकुमार बुनकर की आंखें छलक उठीं और पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए रेलवे परिवार ने “रेलवे के नाम एक वृक्ष” अभियान के अंतर्गत उनसे पौधरोपण कराया, जो समारोह का विशेष आकर्षण बना
सेवानिवृत्ति के बाद जब वे अपने गृह ग्राम टेंगनमाड़ा पहुंचे तो गांववासियों ने पुष्पमालाओं से उनका भव्य स्वागत किया। उनकी धर्मपत्नी रुक्मणी बुनकर ने आरती उतारकर गृह प्रवेश कराया। चारों बच्चों, परिजनों और ग्रामीणों ने उनका आत्मीय अभिनंदन करते हुए उनके योगदान पर गर्व व्यक्त किया।
“रेल की पटरियों पर 36 वर्षों तक जिम्मेदारी का सफर तय करने वाले राजकुमार बुनकर ने साबित किया कि ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा ही किसी कर्मचारी की सबसे बड़ी पहचान होती है। उनकी विदाई ने पूरे रेलवे परिवार और गांव को भावुक कर दिया।”

36 साल तक थामी देश की रेल की रफ्तार, अब सम्मान के साथ थमा सफर">






