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राजिम–छुरा रोड चौड़ीकरण के नाम पर सैकड़ों पेड़ उखाड़े, ठेकेदार की मनमानी पर उठे सवाल

गरियाबंद से देव प्रसाद बघेल की रिपोर्ट
गरियाबंद से देव प्रसाद बघेल की रिपोर्ट

*गरियाबंद*:-जिले में राजिम–छुरा सड़क चौड़ीकरण निर्माण कार्य के दौरान सड़क किनारे लगे सैकड़ों पेड़ों को चैन माउंटेन मशीन से उखाड़कर फेंकने का मामला सामने आया है। आरोप है कि ठेकेदार द्वारा सक्षम अधिकारी के आदेश और आवश्यक अनुमति के बिना ही मशीन से पेड़ों को हटाने की कार्रवाई की गई। इस दौरान बड़े और पुराने पेड़ों को नुकसान पहुंचने के साथ कीमती लकड़ियां भी मौके पर बिखरी पड़ी दिखाई दे रही हैं। घटना ने सड़क निर्माण कार्य में ठेकेदार की कार्यप्रणाली, संबंधित विभाग की निगरानी और वन विभाग की जिम्मेदारी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सड़क चौड़ीकरण को विकास की दृष्टि से जरूरी माना जाता है। सड़क के विस्तार से आवागमन सुविधाजनक होता है और क्षेत्र के लोगों को लाभ मिलता है। लेकिन विकास कार्यों की आड़ में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने और निर्धारित प्रक्रिया की अनदेखी करने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती। यदि निर्माण कार्य के लिए पेड़ों को हटाना आवश्यक था, तो इसके लिए संबंधित विभाग से विधिवत अनुमति, सक्षम अधिकारी का आदेश और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए था। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर राजिम–छुरा मार्ग पर पेड़ों को उखाड़ने की कार्रवाई किसके निर्देश पर की गई?

बिना आदेश मशीन चलाने पर ठेकेदार की भूमिका सवालों के घेरे में

राजिम–छुरा मार्ग पर सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा है। इसी दौरान चैन माउंटेन मशीन के माध्यम से सड़क किनारे लगे पेड़ों को उखाड़े जाने का मामला सामने आया। आरोप है कि ठेकेदार ने आवश्यक आदेश और अनुमति के बिना ही मशीन चलाकर पेड़ों को हटाना शुरू कर दिया। पेड़ों को काटने के बजाय जड़ों समेत उखाड़ने और उन्हें इधर-उधर फेंकने की कार्रवाई से सड़क किनारे हरियाली को नुकसान पहुंचने की बात सामने आई है।

इस मामले में यह जांच का विषय है कि निर्माण कार्य की स्वीकृत योजना में कितने पेड़ों को हटाने का प्रावधान था, कितने पेड़ों को वास्तव में नुकसान पहुंचा और क्या संबंधित विभाग से इसकी अनुमति ली गई थी। यदि अनुमति के बिना पेड़ों को उखाड़ा गया है, तो यह निर्माण कार्य में नियमों के पालन और ठेकेदार की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर मामला है।

कीमती लकड़ियां बिखरीं, निस्तारण का हिसाब कौन देगा?

पेड़ों को नुकसान पहुंचाने के साथ मौके पर कीमती लकड़ियों के बिखरे होने की बात भी सामने आई है। ऐसे में लकड़ियों के निस्तारण और उनकी सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पेड़ों को हटाने की अनुमति जारी हुई थी या नहीं, यदि हुई थी तो कितने पेड़ों के लिए हुई थी, और हटाई गई लकड़ियों को किस विभाग के सुपुर्द किया जाना था—इन सभी बिंदुओं की जांच आवश्यक है।

संबंधित अधिकारियों को मौके का निरीक्षण कर पेड़ों की वास्तविक संख्या, उनकी स्थिति और लकड़ियों की मात्रा का आकलन करना चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि लकड़ियों को सुरक्षित रखने तथा नियमानुसार निस्तारण के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई गई। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों की अनदेखी पाई जाती है, तो जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

वन विभाग के रेंजर का दावा—आदेश नहीं आया, काम रुकवाया

मामले को लेकर वन विभाग के संबंधित रेंजर अधिकारियों ने बताया कि पेड़ कटाई के संबंध में कोई आदेश नहीं आया था। उनके अनुसार, ठेकेदार द्वारा काम शुरू कर दिया गया था। जानकारी मिलने पर विभागीय अधिकारी मौके पर पहुंचे और काम रुकवा दिया गया।

वन विभाग के इस बयान के बाद ठेकेदार की कार्यप्रणाली पर सवाल और गंभीर हो गए हैं। यदि विभाग की ओर से पेड़ हटाने का कोई आदेश जारी नहीं किया गया था, तो निर्माण कार्य के दौरान मशीन से पेड़ों को उखाड़ने की कार्रवाई कैसे शुरू हुई? क्या ठेकेदार ने निर्माण कार्य की स्वीकृत सीमा और शर्तों की जांच की थी? क्या सड़क निर्माण से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों को इस कार्रवाई की जानकारी थी? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा।

वहीं, यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि वन विभाग को मामले की जानकारी कब मिली, मौके पर कितने पेड़ों को नुकसान पहुंच चुका था और काम रुकवाने के बाद आगे क्या कार्रवाई की गई। केवल काम बंद करा देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पूरे घटनाक्रम की जांच कर जिम्मेदारों की भूमिका तय करना भी जरूरी है।

ठेकेदार और संबंधित विभाग के अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग

इस मामले में संबंधित विभागों द्वारा संयुक्त स्थल निरीक्षण कर निर्माण कार्य से जुड़े दस्तावेजों की जांच की जानी चाहिए। पेड़ हटाने संबंधी अनुमति, सक्षम अधिकारी के आदेश, निर्माण कार्य की स्वीकृत योजना और लकड़ियों के निस्तारण से संबंधित रिकॉर्ड की पड़ताल जरूरी है। साथ ही यह भी जांच होनी चाहिए कि निर्माण कार्य की निगरानी करने वाले अधिकारियों ने निर्धारित शर्तों का पालन सुनिश्चित किया था या नहीं।

यदि जांच में बिना अनुमति पेड़ों को उखाड़ने या पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी की पुष्टि होती है, तो संबंधित ठेकेदार के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके साथ ही यदि किसी जिम्मेदार अधिकारी की लापरवाही सामने आती है, तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

विकास जरूरी, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं

राजिम–छुरा सड़क चौड़ीकरण क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण निर्माण कार्य हो सकता है, लेकिन विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। सड़क निर्माण के नाम पर यदि पुराने और बड़े पेड़ों को बिना निर्धारित प्रक्रिया के नुकसान पहुंचाया जाता है, तो इसका असर केवल हरियाली पर ही नहीं, बल्कि स्थानीय पर्यावरण पर भी पड़ सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब वन विभाग के संबंधित रेंजर अधिकारियों के अनुसार पेड़ कटाई का आदेश जारी नहीं हुआ था, तो ठेकेदार ने किस आधार पर मशीन चलाकर पेड़ों को उखाड़ना शुरू किया? क्या संबंधित निर्माण विभाग इस मामले में जांच कराएगा? क्या ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई होगी और कीमती लकड़ियों के निस्तारण का पूरा हिसाब सार्वजनिक किया जाएगा?

फिलहाल वन विभाग द्वारा मौके पर पहुंचकर काम रुकवाए जाने की बात कही गई है। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग इस मामले में कितनी गंभीरता से जांच करता है और पेड़ों को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।

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