
*गरियाबंद*:- ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष रूपेश साहू ने बताया गरियाबंद जिले के किसानों का आरोप है कि ई-टोकन मिलने के बाद भी उन्हें समय पर खाद उपलब्ध नहीं हो रही। सरकारी मूल्य पर मिलने वाली यूरिया की बोरी के लिए किसानों से अतिरिक्त राशि ली जा रही है। कई स्थानों पर किसानों ने आरोप लगाया कि निजी दुकानों पर प्रति बोरी 266 का यूरिया 650 रुपये तक बेचें जा रहे हैं। कुछ किसानों ने इससे भी अधिक कीमत पर यूरिया बिकने की शिकायत की है। और 1350 का डीएपी 2300 से 2500 रूपए में बेच रहे हैं!
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसान ने ई-टोकन लिया, समय पर केंद्र पहुंचा और फिर भी उसे खाद नहीं मिली,तो आखिर इस पूरी डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य क्या रह जाता है? तकनीक का मकसद किसानों की परेशानी कम करना होना चाहिए,न कि उन्हें नई प्रक्रियाओं में उलझाना।
ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष रूपेश साहू ने बताया खरीफ सीजन में समय का बहुत महत्व होता है। धान,के फसलों में शुरुआती पोषण सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि बुआई या रोपाई के समय खाद उपलब्ध नहीं होती तो फसल की शुरुआती बढ़वार प्रभावित होती है। बाद में चाहे जितनी खाद डाल दी जाए, शुरुआती नुकसान की भरपाई पूरी तरह संभव नहीं होती।
किसान का पूरा कृषि कैलेंडर मौसम के अनुसार चलता है। बारिश का एक-एक दिन महत्वपूर्ण होता है। यदि किसान को खाद लेने के लिए कई दिन तक चक्कर लगाने पड़ें, तो केवल उसका समय ही नहीं बल्कि मजदूरी, डीजल, परिवहन और अन्य खर्च भी बढ़ जाते हैं। इसका सीधा असर खेती की लागत पर पड़ता है।
लेकिन जब किसी अच्छी व्यवस्था का जमीनी स्तर पर सही क्रियान्वयन नहीं होता, तब वही व्यवस्था किसानों के लिए परेशानी का कारण बन जाता है। यदि सर्वर बार-बार बंद हो, टोकन समय पर जारी न हों, स्टॉक की जानकारी अपडेट न हो या वितरण केंद्रों पर पर्याप्त कर्मचारी न हों, तो किसान की नाराजगी स्वाभाविक है।
रूपेश साहू ने कहा अब बात करते हैं निजी उर्वरक विक्रेताओं के दृष्टिकोण की।
सभी निजी दुकानदारों को दोषी मान लेना भी उचित नहीं होगा।अनेक लाइसेंसधारी उर्वरक विक्रेता नियमों के अनुसार निर्धारित एमआरपी पर ही खाद बेचते हैं और पूरी बिलिंग करते हैं। लेकिन कुछ विक्रेताओं का कहना है कि परिवहन, मजदूरी, गोदाम, लोडिंग-अनलोडिंग, डिजिटल सिस्टम, बिजली और अन्य परिचालन खर्च लगातार बढ़े हैं। उनका तर्क है कि कई बार उन्हें सीमित मात्रा में स्टॉक मिलता है जबकि मांग बहुत अधिक होती है। ऐसे में ग्राहकों की नाराजगी सबसे पहले दुकानदार को ही झेलनी पड़ती है।
कुछ विक्रेता यह भी कहते हैं कि यदि कोई अतिरिक्त राशि वसूली जाती है तो वह वैध नहीं है और ऐसे मामलों में कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं दूसरी ओर यह भी आरोप लगाया जाता है कि कुछ लोग अवैध रूप से बिना बिल बिक्री, टैगिंग, जबरन अन्य उत्पाद बेचने या अधिक कीमत वसूलने जैसी गतिविधियों में शामिल रहते हैं। यदि ऐसा हो रहा है तो यह न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि ईमानदार विक्रेताओं की छवि भी खराब करता है।
इसलिए आवश्यक है कि प्रशासन ईमानदार और नियमों का पालन करने वाले विक्रेताओं तथा नियम तोड़ने वालों के बीच स्पष्ट अंतर करे। जहां अनियमितता मिले, वहां कठोर कार्रवाई हो, लेकिन पूरे व्यापारिक वर्ग को संदेह की नजर से न देखा जाए।
ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष रूपेश साहू ने कहा किसानों की भी कुछ जिम्मेदारियां हैं। खाद खरीदते समय हमेशा पक्का बिल लें। एमआरपी अवश्य जांचें। यदि कोई दुकानदार निर्धारित मूल्य से अधिक राशि मांगता है, जबरन दूसरे उत्पाद खरीदने का दबाव बनाता है या बिना बिल बिक्री करता है, तो उसकी शिकायत संबंधित कृषि विभाग, जिला प्रशासन या उपभोक्ता हेल्पलाइन पर करें। बिना शिकायत के कई मामलों में कार्रवाई करना कठिन हो जाता है।
प्रशासन के लिए भी कुछ सुधार जरूरी हैं। सबसे पहले ई-टोकन प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए। किसानों को मोबाइल पर वास्तविक स्टॉक की जानकारी मिले। जिस केंद्र पर खाद उपलब्ध हो, वहीं का टोकन जारी किया जाए। यदि स्टॉक समाप्त हो जाए तो किसान को तुरंत सूचना मिले ताकि उसे अनावश्यक यात्रा न करनी पड़े।
इसके अलावा सभी उर्वरक दुकानों पर प्रतिदिन उपलब्ध स्टॉक, प्राप्त स्टॉक और बिक्री का विवरण सार्वजनिक किया जा सकता है। इससे अफवाहें भी कम होंगी और पारदर्शिता भी बढ़ेगी। नियमित औचक निरीक्षण, डिजिटल बिलिंग और जीपीएस आधारित परिवहन निगरानी जैसी व्यवस्थाएं कालाबाजारी रोकने में प्रभावी साबित हो सकती हैं।
ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष रुपए साहू ने कहा कि यदि जिले में वास्तविक मांग अधिक है तो समय रहते अतिरिक्त स्टॉक उपलब्ध कराया जाना चाहिए। कई बार समस्या उत्पादन की नहीं बल्कि वितरण और लॉजिस्टिक्स की होती है। ऐसे मामलों में त्वरित प्रशासनिक हस्तक्षेप किसानों को बड़ी राहत दे सकता है!
खेती केवल किसान का व्यवसाय नहीं बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा की आधारशिला है। यदि किसान समय पर उर्वरक नहीं प्राप्त करेगा तो इसका असर केवल उसकी आय पर नहीं बल्कि खाद्यान्न उत्पादन, बाजार और उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा।








