
*गरियाबंद*:- देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक जैसे मामलों को लेकर युवा लगातार अपने हक और अधिकार की आवाज उठा रहे हैं। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी युवाओं ने प्रदर्शन कर निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग की थी। ऐसे में अब गरियाबंद जिले में लंबे समय से चर्चा में रहे कथित फर्जी शिक्षाकर्मी मामले को लेकर भी एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है—क्या प्रदेश के युवा अब गरियाबंद पहुंचकर इस मामले में निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग को लेकर आंदोलन करेंगे?
गरियाबंद जिले में कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों अथवा संदिग्ध शैक्षणिक प्रमाण-पत्रों के आधार पर शिक्षाकर्मी के पद पर नियुक्ति पाने और वर्षों से नौकरी करने के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं। इस मामले को लेकर जांच और कार्रवाई की मांग भी उठती रही है। लेकिन सवाल यह है कि अगर किसी कर्मचारी की नियुक्ति या शैक्षणिक दस्तावेजों को लेकर गंभीर शिकायतें सामने आती हैं, तो उसकी निष्पक्ष जांच कर वास्तविकता जनता के सामने क्यों नहीं लाई जा रही है?
कई सालों से मामला चर्चा में, फिर भी कार्रवाई पर सवाल
कथित फर्जी शिक्षाकर्मियों का मुद्दा कोई नया नहीं है। लंबे समय से इस मामले को लेकर शिकायतें और सवाल उठते रहे हैं। इसके बावजूद ऐसे मामलों में जांच की स्थिति क्या है, कितने मामलों की जांच पूरी हुई, कितने दस्तावेज सही पाए गए और कितने मामलों में कार्रवाई हुई—इन सवालों का स्पष्ट जवाब आम लोगों के सामने आना जरूरी है।
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि यदि जांच में किसी कर्मचारी के दस्तावेज सही पाए जाते हैं तो उसे सार्वजनिक रूप से क्लीन चिट क्यों नहीं दी जाती और यदि दस्तावेज फर्जी पाए जाते हैं तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई क्यों नहीं की जाती?
युवाओं के सामने बड़ा सवाल—हक की लड़ाई कब?
आज प्रदेश का युवा रोजगार के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों लगा रहा है और एक-एक पद के लिए हजारों युवा आवेदन कर रहे हैं। ऐसे में यदि किसी सरकारी पद पर नियुक्ति को लेकर फर्जीवाड़े या अनियमितता के आरोप सामने आते हैं और वर्षों तक मामला लंबित रहता है, तो यह मेहनत करने वाले युवाओं के बीच असंतोष पैदा करने वाला विषय बन सकता है।
इसी वजह से अब यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि जिस तरह देशभर के युवा अपने अधिकारों और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया की मांग को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं, क्या उसी तरह गरियाबंद जिले के युवा भी कथित फर्जी शिक्षाकर्मी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर आवाज बुलंद करेंगे?
कांग्रेस के बाद भाजपा सरकार पर भी सवाल
इस मामले को लेकर राजनीतिक रूप से भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप लगाए जाते रहे हैं कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भी कथित फर्जी शिक्षाकर्मियों के मामलों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई और अब प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के बावजूद यदि ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच और कार्रवाई नहीं होती है, तो जिम्मेदारी वर्तमान सरकार और संबंधित विभाग की भी बनती है।
हालांकि, पूरे मामले की वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है। इसलिए जरूरी है कि संबंधित विभाग शिकायतों और आरोपों की निष्पक्ष जांच कराए तथा जांच के परिणाम सार्वजनिक करे।
क्या सरकार करेगी निष्पक्ष जांच?
गरियाबंद जिले के युवाओं और आम लोगों के बीच अब यह सवाल चर्चा का विषय बनता जा रहा है कि कथित फर्जी शिक्षाकर्मी मामले में आखिर कब तक जांच और कार्रवाई का इंतजार रहेगा? क्या सरकार सभी संदिग्ध नियुक्तियों की निष्पक्ष जांच कराएगी? क्या दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई होगी? और क्या योग्य युवाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए भर्ती प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित की जाएगी?
अब देखना होगा कि यह मामला केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहता है या गरियाबंद के युवा इस मुद्दे को लेकर संगठित होकर आंदोलन का रास्ता अपनाते हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—देश के युवा जब अपने हक के लिए जंतर-मंतर तक आवाज उठा सकते हैं, तो क्या गरियाबंद के युवा अपने जिले में कथित फर्जी शिक्षाकर्मियों के मामले की निष्पक्ष जांच और कार्रवाई के लिए आवाज उठाएंगे?।








