
*गरियाबंद*:- जिले में कथित फर्जी शिक्षाकर्मियों के मामले को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े होने लगे हैं। आरोप है कि जिले में ऐसे कई कर्मचारी आज भी सरकारी नौकरी का लाभ उठा रहे हैं, जिनकी नियुक्ति और शैक्षणिक दस्तावेजों को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि इन नियुक्तियों में वास्तव में फर्जीवाड़ा हुआ है तो अब तक इसकी निष्पक्ष और व्यापक जांच क्यों नहीं हो सकी और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
मामले को लेकर राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहे हैं, लेकिन आम लोगों के बीच यह सवाल बना हुआ है कि सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या वर्तमान में भाजपा की, कथित फर्जी शिक्षाकर्मियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई जमीन पर दिखाई क्यों नहीं देती?
कांग्रेस शासन में भी उठे थे सवाल, लेकिन कार्रवाई पर संशय
फर्जी शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति का मुद्दा नया नहीं है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भी प्रदेश के अलग-अलग जिलों में फर्जी प्रमाण पत्र और नियुक्तियों को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। गरियाबंद जिले में भी समय-समय पर ऐसे मामलों की जांच और कार्रवाई की मांग उठती रही।
लेकिन सवाल यह है कि यदि शिकायतें सामने आई थीं तो क्या प्रत्येक मामले की निष्पक्ष जांच कर दस्तावेजों का सत्यापन कराया गया? क्या संबंधित विभागों ने नियुक्ति से लेकर शैक्षणिक प्रमाण पत्रों तक की पूरी जांच की? और यदि जांच हुई तो उसका परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
अब भाजपा सरकार के सामने भी बड़ी चुनौती
प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा सरकार से लोगों को उम्मीद थी कि लंबे समय से लंबित ऐसे मामलों की नए सिरे से निष्पक्ष जांच होगी। विशेषकर उन कर्मचारियों के दस्तावेजों का सत्यापन कराया जाएगा, जिनकी नियुक्ति को लेकर गंभीर शिकायतें हैं।
लेकिन यदि आज भी ऐसे कर्मचारी सरकारी पदों पर कार्यरत हैं और उनके खिलाफ शिकायतों के बावजूद जांच पूरी नहीं हुई है, तो वर्तमान सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
सरकार के सामने अब यह स्पष्ट करने की चुनौती है कि गरियाबंद जिले में कथित फर्जी शिक्षाकर्मियों की संख्या कितनी है, कितने मामलों की जांच हुई, कितने दस्तावेज संदिग्ध पाए गए और कितने लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई?
क्या राजनीतिक संरक्षण के कारण मामला दबा हुआ है?
सबसे गंभीर सवाल राजनीतिक संरक्षण को लेकर उठ रहा है। यदि किसी कर्मचारी ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल की है तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था और योग्य बेरोजगार युवाओं के अधिकार से जुड़ा गंभीर विषय है।
ऐसे में यह भी जांच का विषय है कि कहीं किसी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के कारण मामलों को लंबित तो नहीं रखा गया? हालांकि, बिना जांच के किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति पर सीधे संरक्षण देने का आरोप लगाना उचित नहीं होगा। इसलिए जरूरी है कि सरकार स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराकर पूरे मामले की वास्तविकता सामने लाए।
कांग्रेस और भाजपा दोनों से जवाब की मांग
गरियाबंद के लोगों के बीच अब यह सवाल चर्चा का विषय बनता जा रहा है कि यदि कथित फर्जी शिक्षाकर्मियों के खिलाफ पर्याप्त शिकायतें और दस्तावेज मौजूद हैं, तो कांग्रेस शासन के दौरान निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हुई और भाजपा सरकार के कार्यकाल में भी यह मामला पूरी तरह समाप्त क्यों नहीं हुआ?
क्या दोनों राजनीतिक दलों के नेताओं को इस मामले की पूरी जानकारी है? यदि जानकारी है तो निष्पक्ष जांच के लिए अब तक ठोस पहल क्यों नहीं हुई? और यदि जानकारी नहीं है तो संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है।
योग्य बेरोजगारों के साथ अन्याय का सवाल
फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी पाने का आरोप केवल सरकारी व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर उन बेरोजगार युवाओं पर पड़ता है जो वर्षों तक मेहनत करके प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं में शामिल होते हैं।
यदि कोई व्यक्ति गलत दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करता है और लंबे समय तक पद पर बना रहता है, तो वह उस पद के वास्तविक हकदार अभ्यर्थी के अवसर को भी प्रभावित करता है। इसलिए इस मामले में निष्पक्ष जांच केवल आरोपों की पुष्टि करने के लिए नहीं, बल्कि योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी जरूरी है।
अब सरकार से स्पष्ट जांच की मांग
जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर गरियाबंद जिले में कथित फर्जी शिक्षाकर्मियों के मामलों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए। नियुक्ति से लेकर शैक्षणिक प्रमाण पत्र, अनुभव प्रमाण पत्र और अन्य जरूरी दस्तावेजों का सत्यापन कराया जाए।
जांच में यदि कोई कर्मचारी दोषी पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई हो और यदि किसी कर्मचारी पर लगाए गए आरोप गलत पाए जाते हैं तो उसे भी स्पष्ट रूप से निर्दोष घोषित किया जाए।
अब सवाल किसी कांग्रेस या भाजपा के पक्ष में खड़े होने का नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता और योग्य युवाओं के अधिकार का है। गरियाबंद की जनता जानना चाहती है कि आखिर कथित फर्जी शिक्षाकर्मियों के मामले की निष्पक्ष जांच कब होगी और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई कब होगी?








