
“माटी की गोद में बोया बीज, भोजली बनकर दे गया प्रेम, हरियाली और समृद्धि का संदेश।”
उपका :—-छत्तीसगढ़ की माटी में रची-बसी लोक परंपराओं में भोजली का पर्व अपनी अलग पहचान रखता है। यह केवल बीज बोने और विसर्जन की परंपरा नहीं, बल्कि कृषि, प्रकृति, नारी शक्ति, लोकगीत, आपसी प्रेम और भाईचारे को जोड़ने वाला लोकपर्व है। इसी पारंपरिक संस्कृति को जीवंत रखने के उद्देश्य से ग्राम उपका में शासकीय प्राथमिक शाला एवं शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला उपका के संयुक्त तत्वावधान में भोजली विसर्जन पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
नाग पंचमी से शुरू हुई भोजली की यात्रा विसर्जन तक पहुंची। पर्व की शुरुआत नाग पंचमी के दिन हुई थी।
बच्चों ने पारंपरिक तरीके से बांस की छोटी टोकरी यानी टुकनी में कुम्हार के घर की खाद-मिट्टी लाकर गेहूं, धान, जौ, उड़द और मक्का के बीज बोए। भोजली को घर अथवा पूजा के पवित्र स्थान की तरह सुरक्षित जगह पर रखा गया।
प्रतिदिन हल्दी मिले पानी का छिड़काव कर उसकी सेवा की गई और पारंपरिक भोजली सेवा गीतों के माध्यम से प्रकृति एवं अन्नदाता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई।

हरी-पीली भोजली में दिखी अच्छी फसल की उम्मीद
लगभग 7 से 9 दिनों तक सेवा और देखभाल के बाद टुकनी में बोए गए बीज 4 से 6 इंच तक के हरे-पीले पौधों में बदल गए। ग्रामीण लोकमान्यता में भोजली की हरियाली को आने वाले कृषि वर्ष की खुशहाली से जोड़कर देखा जाता है
मान्यता है कि जितनी सुंदर और घनी भोजली उगेगी, खेतों में फसल भी उतनी ही अच्छी होगी। यही वजह है कि भोजली में केवल पौधे नहीं, बल्कि किसान परिवार की उम्मीद, अन्न और समृद्धि का सपना भी दिखाई देता है।

“देवी गंगा…” के गीतों के साथ निकली शोभायात्रा
रक्षाबंधन के दूसरे दिन विद्यालय के बच्चों ने सिर पर भोजली से सजी टोकरी रखकर पूरे गांव में पारंपरिक शोभायात्रा निकाली। बच्चों के कंठ से निकले “देवी गंगा, देवी गंगा लहर तुरंगा…” जैसे पारंपरिक गीतों ने पूरे गांव को लोक संस्कृति के रंग में रंग दिया। ग्रामीणों ने भी बच्चों का उत्साह बढ़ाया और भोजली की इस परंपरा में सहभागी बने।
शोभायात्रा गांव के प्रमुख मार्गों से होते हुए तालाब तक पहुंची, जहां पारंपरिक रीति-रिवाज एवं विधि-विधान के साथ भोजली का विसर्जन किया गया।
भोजली के साथ रिश्तों में घुली मिठास
भोजली विसर्जन के बाद बच्चों और ग्रामीणों ने एक-दूसरे के कान में भोजली की हरियाली खोंसकर “भोजली-भोजली, गंगा जल” कहा छत्तीसगढ़ी परंपरा में यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि मित्रता को मजबूत करने, मनमुटाव भुलाने और आपसी प्रेम-सद्भाव बढ़ाने का संदेश माना जाता है।
बच्चों ने एक-दूसरे के साथ अटूट मित्रता और भाईचारा निभाने का संकल्प लिया तथा परिवार, गांव और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की।
लोकपर्व के बहाने नई पीढ़ी को मिली संस्कृति की सीख
भोजली जैसे पारंपरिक पर्व आज आधुनिकता के दौर में धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं। ऐसे समय में विद्यालय द्वारा बच्चों को भोजली की पूरी परंपरा से जोड़ना लोकसंस्कृति के संरक्षण की महत्वपूर्ण पहल है।
टुकनी में बीज बोने से लेकर सेवा गीत, शोभायात्रा, विसर्जन और कान में भोजली खोंसकर मित्रता निभाने तक की पूरी परंपरा ने बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम किया।
तीन रंगों में दिखी भोजली की पहचान
माटी से जुड़ाव अन्न के प्रति सम्मान रिश्तों में भाईचारा
भोजली ने एक बार फिर संदेश दिया कि“जिस माटी में हमारी संस्कृति की जड़ें हैं, उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी हमारी जिम्मेदारी है।”
उपका में मनाया गया यह पर्व लोकगीतों, हरियाली और सामुदायिक एकता के साथ छत्तीसगढ़ की समृद्ध परंपरा की सुंदर तस्वीर पेश कर गया।
इस अवसर पर ग्राम के गणमान्य नागरिक, महिला समूह, शासकीय प्राथमिक शाला एवं शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला के प्रधान पाठक सहित समस्त शिक्षक-शिक्षिकाएं एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

टुकनी में उगी भोजली, गांव में बिखरी हरियाली की खुशबू">






